वाशिंगटन। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच संभावित बातचीत में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अमेरिकी थिंक टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो माइकल रुबिन ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अमेरिका के लिए “शर्मनाक और खतरनाक” करार दिया है।
पाकिस्तान की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
दरअसल एक लेख में रुबिन ने पाकिस्तान (Pakistan) के पुराने रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए सवाल उठाए हैं और कहा कि उसकी भूमिका अक्सर विवादों से जुड़ी रही है। उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में मदद की थी। ऐसे में उसी देश को मध्यस्थता की जिम्मेदारी देना एक गंभीर रणनीतिक गलती हो सकती है।
भरोसे को लेकर जताई आशंका
रुबिन ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में यहूदी-विरोध और अमेरिका-विरोधी भावनाएं व्यापक हैं, जिससे उस पर भरोसा करना और भी मुश्किल हो जाता है। उन्होंने ओसामा बिन लादेन के मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जब अमेरिकी सेना ने उसे मार गिराया था, तब पाकिस्तान की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही थी।
भारत को बताया बेहतर विकल्प
इस संदर्भ में रुबिन ने भारत का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की संवेदनशील वार्ताओं के लिए भारत अधिक भरोसेमंद विकल्प हो सकता था। उन्होंने भारत को इस स्थिति में सतर्क रहने की सलाह भी दी।
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बातचीत के साथ सख्त चेतावनी
पहले दौर की बातचीत फेल रहने के बाद ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल 20 अप्रैल को पाकिस्तान पहुंचकर ईरान के साथ दूसरे दौर की बातचीत की कोशिश करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों को नहीं माना, तो उसके नागरिक ढांचे को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। हालांकि, ईरान की ओर से इस संभावित वार्ता में शामिल होने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। मौजूदा संघर्षविराम 22 अप्रैल को समाप्त होने वाला है, ऐसे में आने वाले दिनों में क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
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