Asian Economy: ईरान-इजराइल संघर्ष का एशियाई अर्थव्यवस्था पर ‘सुनामी’ जैसा असर

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सप्लाई चेन ठप, बढ़ रहा मंदी का खतरा

वाशिंगटन: ईरान और मिडिल ईस्ट में 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था(Asian Economy) को एक ऐसे भंवर में धकेल दिया है, जिसकी तुलना विशेषज्ञ कोविड-19 महामारी जैसे बड़े संकटों से कर रहे हैं। दुनिया(World) के कुल पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20% हिस्सा जिस ‘होर्मुज जलमार्ग’ से गुजरता है, वहां तनाव के कारण तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो गई है। इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विनिर्माण, परिवहन, कृषि और दवा उद्योग तक फैल चुका है, जिससे लाखों लोगों के सामने रोजी-रोटी (Livelihood) का संकट खड़ा हो गया है

डोमिनो इफेक्ट: एक समस्या से कई संकट

विशेषज्ञों के अनुसार, यह संकट ‘डोमिनो इफेक्ट’ की तरह काम कर रहा है, जहां एक उद्योग की विफलता दूसरे को भी चपेट में ले रही है।

परिवहन और उड्डयन: जेट फ्यूल की कीमतें दोगुनी होने और हवाई मार्गों के बंद होने से मार्च महीने में ही 92,000 से अधिक उड़ानें रद्द हो चुकी हैं। एयरएशिया, कैथे पैसिफिक और एयर इंडिया जैसी बड़ी कंपनियों ने अपनी सेवाएं कम कर दी हैं, जिससे पर्यटन क्षेत्र, विशेषकर श्रीलंका और दक्षिण एशियाई देशों में होटलों की बुकिंग 90% तक गिर गई है।

औद्योगिक ठहराव: कच्चे माल और गैस की कमी ने इंडोनेशिया के निकेल उत्पादन और बांग्लादेश के गारमेंट सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेमीकंडक्टर चिप बनाने के लिए जरूरी हीलियम की आपूर्ति रुकने से इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो रहे हैं।

कृषि और खाद्य सुरक्षा: वियतनाम में खाद की कमी और फिलीपींस में ईंधन की कीमतों के कारण किसानों ने फसलें खेतों में ही छोड़ने का फैसला किया है क्योंकि उन्हें बाजार तक पहुंचाने का खर्च उठाना घाटे का सौदा है।

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भविष्य के लिए चेतावनी और आर्थिक मंदी

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, इस युद्ध के चलते एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 97 अरब डॉलर से लेकर 299 अरब डॉलर तक का नुकसान हो सकता है। हालात इतने नाजुक हैं कि साल के अंत तक लाखों लोगों के गरीबी रेखा के नीचे जाने का डर है। सरकारें महंगाई को नियंत्रित करने के लिए भारी कर्ज ले रही हैं, लेकिन कई कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही आज संघर्ष समाप्त हो जाए, फिर भी तेल और गैस की आपूर्ति श्रृंखला को पूर्ववत स्थिति में आने में सालों का समय लग सकता है। यह आर्थिक संकट एक ‘सुनामी’ की भांति है, जिसने आम आदमी की दैनिक जरूरतों—दवाइयों से लेकर नूडल्स तक—की उपलब्धता और सामर्थ्य को झकझोर कर रख दिया है।

विशेषज्ञों ने इस आर्थिक संकट की तुलना ‘सुनामी’ से क्यों की है?

विशेषज्ञों ने इसे सुनामी इसलिए कहा है क्योंकि यह संकट बहुत तेजी से फैला है और एक साथ ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और रोजगार जैसे प्रमुख क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया है। इसका प्रभाव एक देश से दूसरे देश में लहरों की तरह फैल रहा है और आम नागरिक के जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है।

भारत और श्रीलंका जैसे देशों पर इसका क्या असर पड़ रहा है?

भारत में कई औद्योगिक इलाके ईंधन की कमी के कारण बंद हो गए हैं और दवाओं की कीमतें बढ़ने लगी हैं। वहीं, श्रीलंका जैसे देशों में पर्यटन उद्योग ठप हो गया है, क्योंकि हवाई टिकटों के दाम तीन गुना हो गए हैं और होटल बुकिंग्स में भारी गिरावट आई है।

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Dhanarekha

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