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Rajasthan News : मारवाड़ की ‘नागौरी अश्वगंधा’ को मिला GI टैग

Surekha Bhosle
Surekha Bhosle
Rajasthan News : मारवाड़ की ‘नागौरी अश्वगंधा’ को मिला GI टैग

राजस्थान को कृषि क्षेत्र में बड़ी पहचान

मारवाड़ क्षेत्र में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध ‘नागौरी अश्वगंधा’ को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। इससे राजस्थान के पारंपरिक और विशिष्ट कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

सोजत की मेहंदी के बाद दूसरा कृषि उत्पाद

GI टैग पाने वाला राजस्थान का अगला गौरव- इससे पहले सोजत की मेहंदी को (GI) टैग मिल चुका है। अब नागौरी अश्वगंधा के शामिल होने से राजस्थान कृषि आधारित GI उत्पादों की सूची में और मजबूत हुआ है।

मारवाड़ की तपती रेत और शुष्क जलवायु में उगने वाली एक औषधीय फसल ने अब दुनिया के नक्शे पर अपनी अलग पहचान बना ली है। केंद्र सरकार ने नागौर जिले की विशिष्ट औषधीय फसल ‘नागौरी अश्वगंधा’ को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक (GI टैग) प्रदान कर दिया है। यह उपलब्धि न सिर्फ नागौर जिले, बल्कि पूरे मारवाड़ क्षेत्र के किसानों के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है।

नागौरी अश्वगंधा (Nagauri Ashwagandha) इम्यूनिटी और एनर्जी बूस्टर के साथ दिमाग व हार्ट के लिए बहुत शानदार है। इंटरनेशनल मार्केट में इसकी डिमांड उत्पादन से पांच गुना ज्यादा है। उत्पादन की बात करें तो राजस्थान में देश का 10% हो रहा है

सोजत की मेहंदी के बाद कृषि श्रेणी में यह राजस्थान का दूसरा बड़ा GI टैग है। इस मान्यता से नागौरी अश्वगंधा की शुद्धता, गुणवत्ता और भौगोलिक पहचान पर सरकारी मुहर लग गई है। साथ ही इसके नाम को कानूनी सुरक्षा मिलने से अब बाजार में इसके नाम पर होने वाली मिलावट और फर्जीवाड़े पर प्रभावी रोक लगेगी।

वैज्ञानिक शोध और सामूहिक प्रयासों से मिली कामयाबी

जीआई टैग की इस लंबी प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने में आईसीएआर-औषधीय एवं सुगंधित पादप अनुसंधान निदेशालय (DMAPR), आनंद, राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली और राजस्थान कृषि विभाग की अहम भूमिका रही। इन संस्थानों के तकनीकी सहयोग और किसानों के अनुभव के मेल से नागौरी अश्वगंधा को उसकी मूल पहचान मिली।

क्यों खास है नागौरी अश्वगंधा?

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नागौर जिले की शुष्क जलवायु और रेतीली मिट्टी अश्वगंधा की खेती के लिए बेहद अनुकूल है। यहां उगाई जाने वाली अश्वगंधा की जड़ें अधिक पुष्ट, लंबी और औषधीय तत्वों से भरपूर होती हैं।

  • जड़ों में एल्कलॉइड्स की मात्रा अधिक
  • फल (बेरी) का रंग गहरा और चमकीला लाल
  • गुणवत्ता देश के अन्य क्षेत्रों से अलग

इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण नागौरी अश्वगंधा GI टैग की कसौटी पर खरी उतरी।

उत्पादन में नागौर की बड़ी हिस्सेदारी

देशभर में करीब 5 हजार हेक्टेयर में अश्वगंधा की खेती होती है, जिसमें से 500 हेक्टेयर अकेले नागौर जिले में है। यानी देश के कुल उत्पादन का करीब 10 प्रतिशत योगदान नागौर करता है। अब GI टैग मिलने से इस हिस्सेदारी का सीधा फायदा किसानों को मिलेगा।

किसानों के लिए बदलेगी तस्वीर

  • बिचौलियों की भूमिका सीमित होगी
  • अंतरराष्ट्रीय दवा और आयुर्वेदिक कंपनियां सीधे किसानों से संपर्क करेंगी
  • फसल के दाम बढ़ेंगे
  • निर्यात में इजाफा होगा

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विशेषज्ञों का मानना है कि इससे युवाओं का रुझान औषधीय खेती की ओर बढ़ेगा और किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।

वैश्विक बाजार में बढ़ती है मांग

डेटा ब्रिज मार्केट रिसर्च के अनुसार वैश्विक अश्वगंधा बाजार 2022 से 2029 तक 11.4% CAGR की दर से बढ़ने की संभावना है और 2029 तक इसका आकार 102.72 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। वर्तमान में अश्वगंधा की सालाना मांग करीब 7000 टन है, जबकि भारत में उत्पादन केवल 1500 टन के आसपास है। ऐसे में नागौरी अश्वगंधा का GI टैग भविष्य में उत्पादन विस्तार और निर्यात के नए अवसर खोलेगा।

राज्य का 22वां GI टैग उत्पाद

नागौरी अश्वगंधा को भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अधीन GI टैग प्रोटेक्शन एक्ट-1999 के तहत पंजीकृत किया गया है। यह राजस्थान का 22वां GI टैग उत्पाद और कृषि क्षेत्र में दूसरा उत्पाद है।

इस उपलब्धि के पीछे नागौरी वेलफेयर सोसाइटी की निदेशक पारुल चौधरी के प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जीआई टैग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। ICAR आनंद (गुजरात) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. परमेश्वरलाल सारण तथा कृषि विभाग ने तकनीकी सहयोग देकर इस मिशन को सफल बनाया।

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