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WB- 31 मार्च तक सीमा की जमीन बीएसएफ को सौंपे बंगाल सरकार-हाईकोर्ट

Author Icon By Anuj Kumar
Updated: January 29, 2026 • 9:25 AM
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कोलकाता । भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने बंगाल सरकार के प्रति सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश देते हुए राज्य सरकार को 31 मार्च तक सीमा पर बाड़ लगाने के लिए आवश्यक जमीन सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस मामले में किसी भी प्रकार की देरी स्वीकार्य नहीं है।

सीमा पर तारबंदी शीघ्र पूरी करने के निर्देश

हाई कोर्ट ने कहा कि बीएसएफ को जमीन सौंपे जाने से भारत-बांग्लादेश सीमा के संवेदनशील इलाकों में कंटीले तार की बाड़ लगाने का कार्य तेजी से पूरा किया जा सकेगा। अदालत का मानना है कि सीमा सुरक्षा को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।

भूमि न सौंपने के आरोप पर सुनवाई

यह मामला तब सामने आया जब पूर्व सैन्य अधिकारी डॉ. सुब्रत साहा (Dr Subrat Saha) ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि राज्य सरकार सीमा पर बाड़ लगाने के लिए पहले से अधिग्रहीत भूमि बीएसएफ को सौंपने में टालमटोल कर रही है।

2,216 किलोमीटर लंबी सीमा, 600 किलोमीटर अब भी खुली

अदालत को बताया गया कि पश्चिम बंगाल की लगभग 2,216 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से लगती है। इसमें से करीब 600 किलोमीटर क्षेत्र में अब तक तारबंदी नहीं हो पाई है। इस कारण अवैध घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार अपराध लगातार सामने आते रहते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सुजय पाल और न्यायाधीश पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने राज्य सरकार से सवाल किया कि जब मामला सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, तो भूमि अधिग्रहण में देरी क्यों की जा रही है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आवश्यकता पड़ने पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 40 का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा।

राज्य की निष्क्रियता पर चिंता

हाई कोर्ट ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ा राज्य होने के बावजूद इस दिशा में पर्याप्त पहल न करना बेहद चिंताजनक है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि केंद्र सरकार सीमावर्ती क्षेत्र के लगभग 180 किलोमीटर हिस्से में भूमि अधिग्रहण के लिए पहले ही आवश्यक धनराशि उपलब्ध करा चुकी है।

सामाजिक प्रभाव आकलन को बताया बहाना

अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) प्रक्रिया को आधार बनाकर भूमि हस्तांतरण में देरी करना उचित नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में त्वरित निर्णय अपेक्षित है।

मंत्रिमंडलीय मंजूरी बिना भी अधिग्रहण संभव?

कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन जमीनों के लिए राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी नहीं मिली है, वहां राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में तत्काल आधार पर भूमि अधिग्रहण किया जा सकता है या नहीं, इस पर राज्य और केंद्र सरकार दोनों के बयान सुने जाएंगे।

दोनों पक्षों से हलफनामा तलब

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों को इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

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