नई दिल्ली। बिहार की सियासत में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) राज्य में सरकार और संगठन—दोनों स्तरों पर व्यापक फेरबदल की तैयारी में है। मई के पहले या दूसरे सप्ताह में कैबिनेट विस्तार और संगठन पुनर्गठन को लेकर अहम घोषणाएं हो सकती हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (CM Samrat Choudhary) अपनी पहली कैबिनेट का विस्तार करेंगे, जबकि प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी करीब पांच महीने बाद संगठन में बड़े बदलाव कर सकते हैं।
बीजेपी की रणनीति: सामूहिक नेतृत्व पर जोर
बीजेपी की कार्यशैली के मुताबिक पार्टी किसी एक नेता पर निर्भर रहने के बजाय सामूहिक नेतृत्व को बढ़ावा देती है। बिहार में भी यही रणनीति देखने को मिल रही है, जहां सरकार और संगठन की कमान युवा चेहरों को सौंपी जा रही है। पार्टी के शुरुआती दौर में कैलाशपति मिश्र को राज्य में बीजेपी का ‘भीष्म पितामह’ माना जाता था, जिन्होंने 1980 से 1995 के बीच संगठन को मजबूत आधार दिया। उस दौर में गंगा प्रसाद चौरसिया और सीपी ठाकुर जैसे नेताओं का भी अहम योगदान रहा।
पुराने से नए नेतृत्व तक का सफर
इसके बाद साल 2000 के दशक में सुशील कुमार मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने नई दिशा पकड़ी और राज्य की सत्ता में हिस्सेदारी मजबूत की। उनके साथ अश्विनी कुमार चौबे और प्रेम कुमार जैसे नेताओं को भी आगे बढ़ाया गया। वर्तमान में पार्टी ने नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपते हुए नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष, सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री और संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है।
कैबिनेट विस्तार में बड़े बदलाव के संकेत
सूत्रों के अनुसार, पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद बिहार कैबिनेट का विस्तार होगा, जिसमें बीजेपी कोटे के करीब 30 फीसदी मंत्रियों को बदला जा सकता है। कुछ नए चेहरों को मौका मिलेगा, जबकि 2-3 गैर-प्रदर्शनकारी नेताओं को बाहर किया जा सकता है। साथ ही, संगठन में भी बड़े स्तर पर बदलाव की तैयारी है।
संगठन में भी फेरबदल तय
प्रदेश संगठन में महामंत्री और उपाध्यक्ष स्तर पर फेरबदल तय माना जा रहा है। मौजूदा महामंत्रियों में से कुछ को बदला जा सकता है, जबकि उपाध्यक्ष पद से 6-7 पुराने चेहरों की छुट्टी संभव है। वहीं, कुछ नेताओं को प्रमोशन भी मिल सकता है।
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नए विस्तार में इन बातों पर फोकस
नए संगठन विस्तार में पार्टी युवा, महिला और जमीनी स्तर पर सक्रिय नेताओं को प्राथमिकता देगी। इसके साथ ही पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर रहेगा। फिलहाल प्रदेश कार्यसमिति में 35 सदस्य हैं, जिनमें सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए सवर्ण, ईबीसी, ओबीसी और दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व शामिल है।
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