Delhi- लिव-इन पार्टनर को पेंशन पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, केंद्र से विचार को कहा

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लिव-इन पार्टनर
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नई दिल्ली। क्या अब सरकारी कर्मचारी रिटायर होने पर अपनी लिव-इन-पार्टनर (Live in Partner) को भी पेंशन की सुविधा दिला सकेंगे—यह सवाल दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi Highcourt) के एक हालिया निर्देश के बाद चर्चा में आ गया है। हालांकि अंतिम फैसला केंद्र सरकार को ही लेना है।

हाईकोर्ट के निर्देश से उठा बड़ा सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक याचिका के बाद यह मामला सामने आया है, जिसमें लिव-इन-पार्टनर और बच्चों को फैमिली पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाएं देने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता की निजी परिस्थितियों का मामला

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उसकी पत्नी बिना तलाक दिए उसे छोड़कर चली गई थी। इसके बाद वह 1983 से दूसरी महिला के साथ रहने लगा, जिनसे उसके दो बच्चे भी हैं।

विभागीय कार्रवाई और वेतन कटौती

1990 में दूसरी महिला के साथ रहने के कारण पत्नी और बेटी की उपेक्षा का आरोप लगा, जिसके बाद विभागीय कार्रवाई हुई और चार साल तक वेतन में चार स्टेज की कटौती की सजा दी गई।

गलतबयानी का आरोप, पेंशन पर भी गिरी गाज

रिटायरमेंट से पहले 2011 में याचिकाकर्ता पर अपने पार्टनर और बच्चों के लिए डिप्लोमैटिक पासपोर्ट अप्लाई (Diplomatic Passport Apply) करते समय गलत जानकारी देने का आरोप लगा। इसके बाद जांच हुई और मासिक पेंशन व ग्रेच्युटी का 50 फीसदी रोकने का फैसला किया गया।

हाईकोर्ट ने केंद्र से दोबारा विचार को कहा

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से दोबारा विचार करने को कहा है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि उसकी लिव-इन-पार्टनर और बच्चों के नाम फैमिली पेंशन और हेल्थकेयर सुविधाओं के लिए पेंशन पेमेंट ऑर्डर में जोड़े जाएं।

कोर्ट की टिप्पणी: रिश्ता छिपाया नहीं गया

जस्टिस नवीन चावला और मधु जैन की बेंच ने कहा कि रिटायर्ड कर्मचारी ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया। ऐसे में पार्टनर और बच्चों को परिवार में शामिल करने की कोशिश को गलत ठहराकर रिटायरमेंट लाभ रोकना उचित नहीं है।

कैट का 2018 का आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने 2018 के सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पेंशन और ग्रेच्युटी का 50 फीसदी रोकने के फैसले को सही ठहराया गया था।

पूरी पेंशन और ब्याज देने के निर्देश

कोर्ट ने कहा कि मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी का 50 फीसदी स्थायी रूप से रोकने का कोई वैध कारण नहीं है। इसलिए पूरी राशि जारी की जाए और देरी पर 6 फीसदी सालाना ब्याज भी दिया जाए।

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फैमिली पेंशन और सीजीएचएस पर भी विचार

हाईकोर्ट ने संबंधित सरकारी विभाग को निर्देश दिया कि फैमिली पेंशन और सीजीएचएस सुविधाओं के लिए पेंशन पेमेंट ऑर्डर में लिव-इन-पार्टनर और उनके बच्चों का नाम शामिल करने की अपील पर भी विचार किया जाए।

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Anuj Kumar

लेखक परिचय

Anuj Kumar

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