1880 में Paris में आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या: Menka Gandhi की चर्चा

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menkA gandhi
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पेरिस, 12 अगस्त 2025: 1880 के दशक में पेरिस में आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसका जिक्र हाल ही में भारत की प्रख्यात पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने किया।

यह घटना फ्रांसीसी क्रांति से लेकर प्रथम विश्व युद्ध तक पेरिस में आवारा कुत्तों के खिलाफ नीतियों का हिस्सा थी, जिसे इतिहासकार क्रिस पीयरसन (Pearson) ने अपनी रचना Stray Dogs and the Making of Modern Paris में विस्तार से दर्ज किया है। मेनका गांधी ने इस घटना का उल्लेख भारत में आवारा कुत्तों के प्रबंधन और पशु क्रूरता के खिलाफ अपनी मुहिम के संदर्भ में किया, जिसने देश में तीखी बहस छेड़ दी है

1880 में पेरिस में क्या हुआ था?

19वीं सदी के अंत में पेरिस तेजी से आधुनिकीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा था। इस दौरान रेबीज (हाइड्रोफोबिया) का डर, सार्वजनिक स्वच्छता आंदोलन, और अपराध व आवारगी की चिंताएँ चरम पर थीं। आवारा कुत्तों को शहर की गलियों में ‘खतरनाक वर्ग’ का हिस्सा माना जाता था, जो गंदगी, बीमारी और असुरक्षा का प्रतीक थे। 1880 के दशक में पेरिस प्रशासन ने रेबीज के खतरे को कम करने और शहर को ‘आधुनिक’ बनाने के लिए आवारा कुत्तों की बड़े पैमाने पर हत्या शुरू की।

इस अभियान में हजारों कुत्तों को जहर देकर, गोली मारकर या डुबोकर मार डाला गया। इस नीति को तत्कालीन समाज के अभिजात वर्ग और सार्वजनिक स्वच्छता विशेषज्ञों ने समर्थन दिया, क्योंकि वे आवारा कुत्तों को अपराधियों और आवारा लोगों के समान मानते थे। इस दौरान केवल नस्ल वाले पालतू कुत्तों को ‘सुरक्षित’ और ‘उपयोगी’ माना गया, जबकि आवारा कुत्तों को ‘बेकार’ और ‘खतरनाक’ करार दिया गया। यह हत्या अभियान सामाजिक नियंत्रण और शहरी सुधार का हिस्सा था, जिसने पेरिस को ‘स्वच्छ और सुरक्षित’ बनाने का दावा किया।

मेनका गांधी का संदर्भ और भारत में चर्चा

मेनका गांधी, जो भारत में पशु अधिकारों की प्रमुख हस्ती और पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) की संस्थापक हैं, ने इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र भारत में आवारा कुत्तों की हत्या के खिलाफ अपने तर्क को मजबूत करने के लिए किया। उन्होंने तर्क दिया कि पेरिस की तरह क्रूर हत्याएँ न केवल नैतिक रूप से गलत हैं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान भी नहीं देतीं।

इसके बजाय, उन्होंने एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) और टीकाकरण जैसे मानवीय उपायों की वकालत की, जिन्हें उन्होंने 1990 के दशक में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के जरिए लागू करवाया। गांधी का मानना है कि आवारा कुत्तों की हत्या न केवल पशु क्रूरता को बढ़ावा देती है, बल्कि यह रेबीज और जनसंख्या नियंत्रण की समस्या को हल नहीं करती।

भारत में यह मुद्दा

आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और रेबीज के मामले लगातार सुर्खियों में हैं। केरल जैसे राज्यों में आवारा कुत्तों की हत्या के खिलाफ मेनका गांधी और उनकी संस्था ने कड़ा रुख अपनाया है। दूसरी ओर, कुछ लोग, खासकर शहरी क्षेत्रों में, आवारा कुत्तों को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं।

महात्मा गांधी के 1926 के लेख का हवाला देते हुए, जिसमें उन्होंने आवारा कुत्तों की हत्या को कुछ परिस्थितियों में ‘न्यूनतम हिंसा’ बताया था, कई लोग मेनका गांधी के विचारों को अव्यवहारिक मानते हैं। इस विरोधाभास ने भारत में तीखी बहस को जन्म दिया है, जहाँ एक तरफ पशु अधिकारों की वकालत है, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा की चिंता।

1880 में पेरिस की घटना एक ऐतिहासिक उदाहरण है, जो क्रूरता और नियंत्रण के नाम पर की गई कार्रवाइयों की विफलता को दर्शाता है। मेनका गांधी ने इस संदर्भ का उपयोग भारत में आवारा कुत्तों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए किया। भारत में यह बहस इसलिए गर्म है, क्योंकि यह न केवल पशु कल्याण, बल्कि सामाजिक, नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को छूती है। यह एक जटिल समस्या है, जिसका समाधान संतुलित और दीर्घकालिक नीतियों में निहित है।

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