असम (Assam) के गोलाघाट जिले में अतिक्रमण के खिलाफ चल रहे व्यापक अभियान ने एक और बड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार, 8 अगस्त 2025 को, नेघेरिबिल क्षेत्र के दयांग आरक्षित वन में 146 परिवारों को बेदखल कर 4,000 बीघा से अधिक वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। यह अभियान असम सरकार की पर्यावरण संरक्षण और वन भूमि पुनर्ग्रहण की रणनीति का हिस्सा है, जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कर रहे हैं।
अभियान का विवरण
गोलाघाट जिला प्रशासन, वन विभाग, असम पुलिस, और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के संयुक्त प्रयासों से यह बेदखली शांतिपूर्ण तरीके से पूरी की गई। पड़ोसी नागालैंड सरकार ने भी इस अभियान में सहयोग प्रदान किया। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, नेघेरिबिल गांव नंबर 2 में अवैध बस्तियों को हटाया गया, और इस दौरान कोई बड़ा प्रतिरोध नहीं हुआ। वित्त मंत्री और गोलाघाट विधायक अजंता नियोग ने कहा कि यह अभियान मूल निवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा और वन क्षेत्रों की पारिस्थितिक अखंडता को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
गोलाघाट में सिलसिलेवार कार्रवाई यह बेदखली अभियान
पिछले दो हफ्तों में गोलाघाट में हुई कई कार्रवाइयों का हिस्सा है। 30 जुलाई को, उरियमघाट के रेंगमा रिजर्व फॉरेस्ट में 3,000 बीघा भूमि से 278 घरों और एक सुपारी प्रसंस्करण इकाई को ध्वस्त किया गया। इसके बाद, 4 अगस्त को नामबर दक्षिण रिजर्व फॉरेस्ट से 350 से अधिक परिवारों को हटाकर 1,000 बीघा भूमि मुक्त कराई गई। अब तक, गोलाघाट में 10,000 बीघा से अधिक वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया जा चुका है।
सियासी और सामाजिक विवाद
इस अभियान ने सियासी और सामाजिक तनाव को भी जन्म दिया है। स्थानीय लोगों और कुछ संगठनों ने दावा किया कि बेदखल किए गए अधिकतर परिवार बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय से हैं, और यह अभियान उन्हें लक्षित कर रहा है। कुछ प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें पूर्व सरकार ने असम-नागालैंड सीमा की सुरक्षा के लिए इन क्षेत्रों में बसाया था। दूसरी ओर, सरकार ने स्पष्ट किया कि जिनके पास वन अधिकार समिति (FRC) प्रमाणपत्र हैं, उन्हें नहीं हटाया गया, और यह कार्रवाई केवल अवैध अतिक्रमणकारियों पर केंद्रित है।

व्यापक प्रभाव और भविष्य की योजना
असम सरकार ने अब तक 1,19,548 बीघा वन और राष्ट्रीय उद्यान भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यह अभियान जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन के लिए जरूरी है। गोलाघाट के बाद, धिंग, रुपोही, समगुरी, और कालियाबोर में भी बेदखली की योजना है। हालांकि, विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और इस अभियान की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण या मानवीय संकट?
यह अभियान जहां वन्यजीव गलियारों और पारिस्थितिक संरक्षण को बढ़ावा दे रहा है, वहीं बेदखल परिवारों के सामने आजीविका और आवास का संकट खड़ा हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को पुनर्वास के लिए ठोस नीति बनानी होगी ताकि पर्यावरण और मानवीय चिंताओं में संतुलन बनाया जा सके। गोलाघाट का यह अभियान असम के पर्यावरण संरक्षण प्रयासों का एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी मानवीय लागत पर भी गंभीर चर्चा की जरूरत है।
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