नई दिल्ली। मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में 58 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। इस पर राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कड़ी आपत्ति जताई है और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।
58 लाख नाम हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग से सवाल किया कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम आखिर कैसे काट दिए गए। कोर्ट ने चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाते हुए एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला करार दिया।
टीएमसी सांसद की याचिका पर सुनवाई
यह याचिका टीएमसी सांसद डोला सेन की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान वैध दस्तावेजों को मान्यता नहीं दी गई, जिसके चलते लाखों मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से अवैध रूप से हटा दिए गए।
कपिल सिब्बल ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (Kapil Sibbal) ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग जमीनी स्तर के अधिकारियों को व्हाट्सऐप संदेशों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौखिक निर्देश दे रहा है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से जुड़े सभी निर्देश लिखित होने चाहिए ताकि जवाबदेही तय की जा सके।
आयोग को एक हफ्ते में जवाब देने का आदेश
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची की पीठ ने निर्वाचन आयोग के वकील को सख्त निर्देश दिए कि वे शनिवार तक अपना पक्ष स्पष्ट करें। मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी को तय की गई है।
दावों और आपत्तियों की समयसीमा बढ़ाने की मांग
डोला सेन ने कोर्ट से 15 जनवरी की उस समयसीमा को आगे बढ़ाने की भी मांग की है, जो दावों और आपत्तियों को दर्ज करने की अंतिम तारीख है। उनका तर्क है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटने के बाद पर्याप्त समय देना जरूरी है।
वोटरों की संख्या में भारी गिरावट
याचिका में बताया गया है कि 16 दिसंबर को प्रकाशित ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल में 58 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए, जिससे पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई। आरोप है कि यह कार्रवाई बिना किसी पूर्व नोटिस या व्यक्तिगत सुनवाई के की गई।
किन दस्तावेजों को मान्यता देने की मांग
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि पंचायत निवास प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर और स्थायी निवास प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजों को वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए वैध माना जाए।
चुनाव से पहले बढ़ी चिंता
याचिका में आशंका जताई गई है कि दोषपूर्ण फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के तुरंत बाद बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है। ऐसे में लाखों योग्य मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह सकते हैं।
Read More :