Sea: समुद्र पर भारत की ऐतिहासिक विजय

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बिना बिजली और आधुनिक तकनीक के ओमान पहुंचा ‘कौंडिन्य’

नई दिल्ली: भारत की 2000 साल पुरानी समुद्री(Sea) परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए, स्वदेशी रूप से निर्मित जहाज INSV ‘कौंडिन्य’ ने गुजरात के पोरबंदर(Porbandar) से ओमान के मस्कट तक का सफर सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। कमांडर विकास श्योराण के नेतृत्व में 16 सदस्यीय क्रू ने 18 दिनों तक समुद्र की लहरों का सामना किया। इस यात्रा की सबसे खास बात यह थी कि जहाज में न तो इंजन था, न जीपीएस और न ही बिजली। क्रू मेंबर्स ने केवल सिर पर बंधे हेडलैंप्स के सहारे रातें बिताईं और मटके के पानी व खिचड़ी-अचार के भरोसे इस ऐतिहासिक मिशन को अंजाम दिया

अजंता की पेंटिंग से हकीकत तक का सफर

INSV ‘कौंडिन्य’ का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था। इसका डिजाइन अजंता की गुफाओं में मिली 5वीं सदी की एक पेंटिंग पर आधारित है। गोवा की ‘होड़ी इनोवेशंस’ कंपनी ने केरल के कारीगरों के साथ मिलकर इसे ‘टांका पद्धति’ से बनाया है, जिसमें लकड़ी के तख्तों को कीलों के बजाय नारियल(Sea) के रेशों से सिला गया है। यह जहाज पूरी तरह से सूती पाल (सढ़) और हवा के रुख पर निर्भर है। प्रोजेक्ट हेड संजीव सान्याल के नेतृत्व में इस जहाज को तैयार करने का उद्देश्य दुनिया को प्राचीन भारतीय जहाज निर्माण कौशल की ताकत दिखाना था।

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सांस्कृतिक दूत और समुद्री प्रतीक

जहाज का नाम पहली सदी के महान नाविक ‘कौंडिन्य’ के सम्मान में रखा गया है। जहाज की बनावट में प्राचीन प्रतीकों जैसे गंडभेरुंड, सूर्य और हड़प्पा शैली के लंगर का उपयोग किया गया है, जो भारत के गौरवशाली अतीत को दर्शाते हैं। भारतीय नौसेना और संस्कृति(Sea) मंत्रालय के इस साझा प्रयास ने यह साबित कर दिया है कि प्राचीन भारतीय तकनीक आज भी समुद्र की चुनौतियों से लड़ने में सक्षम है। मस्कट पहुंचने पर पूरी टीम का भव्य स्वागत हुआ, जिसे भारतीय समुद्री खोज और व्यापार के पुनरुत्थान के रूप में देखा जा रहा है।

INSV ‘कौंडिन्य’ के निर्माण में किस विशेष तकनीक का उपयोग किया गया है?

इस जहाज को 2000 साल पुरानी ‘टांका पद्धति’ से बनाया गया है। इसमें लकड़ी के तख्तों को जोड़ने के लिए लोहे की कीलों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें नारियल के रेशों से हाथ से सिला गया है। इसके अलावा, जहाज(Sea) को मोड़ने के लिए आधुनिक पतवार की जगह प्राचीन ‘स्टीयरिंग बोर्ड’ का उपयोग किया गया है।

18 दिनों की इस कठिन समुद्री यात्रा के दौरान क्रू मेंबर्स को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

क्रू मेंबर्स को बिना किसी आधुनिक सुख-सुविधा के रहना पड़ा। जहाज पर बिजली न होने के कारण वे केवल हेडलैंप का उपयोग करते थे। सोने के लिए कोई कमरा नहीं था, इसलिए वे स्लीपिंग बैग का इस्तेमाल करते थे। भोजन के नाम पर उन्होंने केवल खिचड़ी और अचार का सेवन किया और पानी के लिए पारंपरिक मिट्टी के मटकों का उपयोग किया। यह यात्रा पूरी तरह से हवा की गति और दिशा पर आधारित थी।

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Dhanarekha

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