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MP : तानसेन के स्मारक की मौलिकता और गरिमा बनाए रखना जरुरी: हाइकोर्ट

Anuj Kumar
Anuj Kumar
MP : तानसेन के स्मारक की मौलिकता और गरिमा बनाए रखना जरुरी: हाइकोर्ट

ग्वालियर। महान संगीतकार तानसेन, मुगल बादशाह अकबर के दरबार के नौ रत्नों में शामिल थे। अकबर बादशाह ने उन्हें संगीत सम्राट की उपाधि से नवाजा था। मुगल दरबार (Mugal Darbar)से पहले वह रीवा के राजा रामचंद्र सिंह के दरबार में थे, जहां उन्होंने संगीत का अभ्यास किया। बाद में वह मुगल बादशाह अकबर के दरबार में चले गए। तानसेन का असली नाम रामतनु पांडेय था। वह कवि और संगीतकार स्वामी हरिदास के अनुयायी थे। तानसेन का जन्म 15वीं सदी की शुरुआत में मध्य प्रदेश (MP) के ग्वालियर के ग्राम बेहट में हुआ था।

संगीत की दुनिया में इस स्थान को महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है

तानसेन की मृत्यु 1585 में हुई थी, जिसके बाद उन्हें ग्वालियर में सूफी संत हजरत शेख मुहम्मद गौस की समाधि के पास ही दफनाया गया था। तानसेन शेख मुहम्मद गौस के शिष्य थे। संगीत की दुनिया में इस स्थान को महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। आज भी उनके समाधि स्थल पर संगीत प्रेमी जुटते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। तानसेन को मुस्लिम रीति-रिवाज के मुताबिक दफनाया गया था, जिससे पता चलता है कि संगीतकार ने एक समय में इस्लाम धर्म अपना लिया होगा।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह अपील खारिज कर दी

हालांकि अन्य स्रोतों का दावा है कि उनको दफन करने में हिंदू परंपरा का पालन किया गया था। हजरत शेख मुहम्मद गौस के मकबरे को प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष के तहत 1962 में राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। तानसेन के समाधि स्थल को लेकर ताजा विवाद इसलिए उठा है क्योंकि यहां पर धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां करने की अनुमति मांगी गई थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह अपील खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि तानसेन की समाधि वाला स्मारक संरक्षित किए जाने का हकदार है। कोर्ट ने इसे राष्ट्रीय महत्व की धरोहर बताते हुए कहा कि स्मारक की मौलिकता और गरिमा बनाए रखना जरुरी है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति हिर्देश की युगल पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियां परिसर को क्षति पहुंचा सकती हैं, जो ‘राष्ट्रीय क्षति’ के समान होगी। अनुमति मांगने वाली याचिका सैयद सबला हसन ने दायर की थी। वह खुद को शेख मोहम्मद गौस का सज्जादा नशीन यानी उत्तराधिकारी बताते हैं। उन्होंने दावा किया कि इस जगह पर पिछले 400 सालों से धार्मिक आयोजन होते आ रहे हैं, लेकिन 1962 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे संरक्षित घोषित कर सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी।

धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है

कोर्ट ने कहा कि यह स्मारक केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है। इसे मूल स्वरूप में सुरक्षित रखना जरूरी है। कोर्ट ने तानसेन की समाधि का उल्लेख करते हुए कहा कि तानसेन मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल थे और ध्रुपद शैली के महान साधक माने जाते हैं। इस धरोहर का संरक्षण पूरे देश की जिम्मेदारी है। 1563 में शेख मुहम्मद गौस की मृत्यु के कुछ समय बाद निर्मित इस मकबरे का महत्वपूर्ण वास्तुशिल्प और ऐतिहासिक महत्व है। इसे अकबर के शासनकाल (1556-1605) की सबसे उल्लेखनीय संरचनाओं में से एक माना जाता है।

दशकों से तीर्थयात्रियों और संगीत प्रेमियों दोनों को आकर्षित किया है

मकबरे की चौकोर इमारत के ऊपर एक बड़ा, छोटा गुंबद है और इसके दोनों ओर छतरियां हैं। जो इसे बहुस्तरीय रूप देती हैं। मकबरे के केंद्रीय कक्ष के चारों ओर पत्थर की जाली का एक बरामदा है, जहां सूफी संत ने काफी समय बिताया था। ये तत्व बाद के स्मारकों जैसे कि फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की कब्र का पूर्वाभास देते हैं। तानसेन को सूफी पीर की कब्र के बगल में दफनाया गया है। इस जगह के साथ उनके जुड़ाव ने इसके सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ा दिया है, जिसने दशकों से तीर्थयात्रियों और संगीत प्रेमियों दोनों को आकर्षित किया है।

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