युवाओं के लिए ‘फाइंडिंग नीमो’ से लेकर 2047 के भारत तक का विजन
नई दिल्ली: शुभांशु शुक्ला(Shubhanshu Shukla) ने युवाओं को फिल्म ‘फाइंडिंग नीमो’ के प्रसिद्ध सबक ‘बस तैरते रहो’ (प्रयत्न करते रहो) के माध्यम से हार न मानने की सलाह दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक या दो असफलताएं किसी व्यक्ति का भविष्य तय नहीं करतीं। अंतरिक्ष यात्री के चयन की प्रक्रिया का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन में लचीलापन (Resilience) और असफलताओं से उबरने की क्षमता को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। उनके अनुसार, सफलता का असली मार्ग अपनी संतुष्टि को त्यागकर निरंतर प्रगति की दिशा में बढ़ते रहने में है।
जो पास है उसका सम्मान और वर्तमान पर ध्यान
शुक्ला(Shubhanshu Shukla) ने एक बहुत ही व्यावहारिक जीवन दर्शन साझा किया: “हमारे पास क्या नहीं है, उस पर दुखी होने के बजाय हमारे पास जो है, उसका भरपूर उपयोग करें।” उन्होंने युवाओं से अनुरोध किया कि वे ‘अगर-मगर’ की कल्पनाओं में जीने के बजाय वर्तमान क्षण (Present Moment) पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने स्वयं का उदाहरण देते हुए बताया कि वे बचपन में लड़ाकू पायलट बनने का सपना नहीं देखते थे, लेकिन जो अवसर उनके सामने आए, उन्होंने उनमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। यही दृष्टिकोण सफलता को बिना मांगे आपके पास खींच लाता है।
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अंतरिक्ष में भारत की छलांग और 2047 का संकल्प
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर 18 दिन बिताने के बाद, शुक्ला(Shubhanshu Shukla) का मानना है कि वहां से मिले अनुभव भारत के अपने अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण में मील का पत्थर साबित होंगे। उन्होंने गगनयान और चंद्रमा मिशनों की जिम्मेदारी आज के बच्चों और युवाओं पर डाली है। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि देश की नीयत और कड़ी मेहनत सही दिशा में हो, तो हम 2047 से पहले ही ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। अंतरिक्ष में शोध के नए द्वार खुलने से भारतीय वैज्ञानिकों के लिए अब संभावनाएं असीमित हैं।
शुभांशु शुक्ला के अनुसार अंतरिक्ष यात्री के चयन के दौरान किन विशेष गुणों को देखा जाता है?
शुभांशु शुक्ला(Shubhanshu Shukla) के अनुसार, चयन के दौरान मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन में उम्मीदवार के लचीलेपन और उसकी असफलताओं से उबरने की क्षमता को प्रमुखता से देखा जाता है। यह देखा जाता है कि विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति कैसे खुद को संभालता है और आगे बढ़ता है।
‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को लेकर शुभांशु शुक्ला का क्या दृष्टिकोण है?
उनका मानना है कि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य युवाओं की जिम्मेदारी है। यदि हम अपनी नीयत सही रखें और खुद पर विश्वास करें, तो हम इस मील के पत्थर को निर्धारित समय (2047) से पहले भी हासिल कर सकते हैं।
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