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Operation kagar maoist : अब सिर्फ 60 नक्सली ही बचे?

Sai Kiran
Sai Kiran
Operation kagar maoist : अब सिर्फ 60 नक्सली ही बचे?

Operation kagar maoist : देश में माओवादी आंदोलन के अंत को लेकर अब नई चर्चा शुरू हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा चलाया गया “ऑपरेशन कगार” नक्सल आंदोलन के लिए बड़ा झटका साबित हुआ है। सरकार ने पहले ही घोषणा की थी कि इस महीने की 31 तारीख तक यह अभियान अंतिम चरण में पहुंच जाएगा। इसी वजह से अब यह सवाल उठ रहा है कि देश में अभी कितने माओवादी बचे हैं और वे कहां छिपे हुए हैं। साथ ही माओवादी आंदोलन के वरिष्ठ नेता गणपति कहां हैं, यह भी बड़ा सवाल बन गया है।

ऑपरेशन कगार का असर

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार माओवादी संगठन के कई बड़े नेता मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं, जबकि कई अन्य ने आत्मसमर्पण कर दिया है। फिलहाल संगठन के केंद्रीय नेतृत्व में सक्रिय नेताओं में मिसिर बेसरा उर्फ सुनील ही भूमिगत बताए जा रहे हैं। उनके साथ राज्य समिति के नेता आसिम मंडल और करीब 60 अन्य माओवादी अभी भी सक्रिय हो सकते हैं।

इनकी तलाश में सुरक्षा बलों ने बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन शुरू किया है। झारखंड के सारंडा जंगल क्षेत्र में इनके छिपे होने की संभावना के चलते करीब 15 हजार सीआरपीएफ, बीएसएफ और आईटीबीपी जवानों को तैनात किया गया है। लगभग 800 वर्ग किलोमीटर में फैले इस जंगल को पूरी तरह खंगाला जा रहा है। गांवों में पोस्टर लगाकर लोगों से जानकारी जुटाई जा रही है। सुरक्षा बलों को आशंका है कि जंगलों में आईईडी बम और हथियार छिपाकर रखे गए हैं, इसलिए बहुत सावधानी से तलाशी अभियान चलाया जा रहा है।

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गणपति की तलाश

इस बीच माओवादी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक गणपति उर्फ मुप्पाला (Operation kagar maoist) केशवराव का ठिकाना अब भी रहस्य बना हुआ है। आत्मसमर्पण कर चुके कई माओवादियों को भी उनके बारे में जानकारी नहीं है। पहले खबरें थीं कि वह बीमार हैं और नेपाल में रह रहे हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

कहा जा रहा है कि मौजूदा हालात में गणपति भी जल्द आत्मसमर्पण कर सकते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah संसद में नक्सलवाद के मुद्दे पर चर्चा और प्रस्ताव ला सकते हैं। यदि गणपति और उनके कुछ प्रमुख सहयोगी आत्मसमर्पण करते हैं तो देश में चार दशकों से जारी माओवादी आंदोलन के लगभग समाप्त होने की घोषणा की जा सकती है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि लगातार मुठभेड़ों और आत्मसमर्पणों के कारण नक्सल आंदोलन अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

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