गुवाहाटी। असम विधानसभा चुनाव के करीब आते ही राज्य की राजनीति में जुबानी जंग और तीखी हो गई है। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल (Badruddin Ajmal) के एक ताजा बयान ने राज्य के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
मिया’ बयान से सियासत में उबाल
गुवाहाटी में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए अजमल ने दावा किया कि आगामी चुनाव के बाद असम की राजनीति में मिया समुदाय का दबदबा काफी बढ़ जाएगा और वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himant Biswa Sarma) का प्रभाव कम हो जाएगा। उनका कहना है कि चुनाव परिणामों के बाद राज्य का सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा।
‘मिया’ शब्द और राजनीतिक मायने
असम की राजनीति में ‘मिया’ शब्द का प्रयोग बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए किया जाता है। राज्य की करीब 3.12 करोड़ की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 34 प्रतिशत है, जिसमें से बड़ा हिस्सा बंगाली भाषी मुसलमानों का है। अजमल का यह बयान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के उस पिछले विवादित बयान के जवाब के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पिछले पांच वर्षों में उनकी सरकार ने मियाओं के हाथ-पैर तोड़े हैं और अगले पांच वर्षों में उनकी कमर तोड़ दी जाएगी। इन बयानों के बाद राज्य में ध्रुवीकरण की राजनीति और तेज होने की संभावना है।
ओवैसी की एंट्री से मुकाबला और दिलचस्प
इस चुनावी समर में एआईयूडीएफ (AIUDF) को असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का भी साथ मिल रहा है। अजमल ने जानकारी दी है कि ओवैसी 2 और 3 अप्रैल को असम के दौरे पर रहेंगे, जहां वे विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम आठ जनसभाओं को संबोधित करेंगे।
अजमल के लिए साख की लड़ाई
खुद बदरुद्दीन अजमल इस बार बिन्नाकांडी सीट से मैदान में हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में धुबरी सीट से मिली करारी हार के बाद यह चुनाव उनके लिए साख की लड़ाई बन गया है।
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9 अप्रैल को मतदान, 4 मई को नतीजे
पार्टी के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो 2016 में एआईयूडीएफ ने 13 सीटें जीती थीं, जबकि 2021 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर यह आंकड़ा 15 तक पहुंचा था। इस बार 2026 के चुनाव में पार्टी ने 28 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। असम की सभी 126 विधानसभा सीटों के लिए 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा, जबकि चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। यह चुनाव तय करेगा कि राज्य की सत्ता की चाबी किसके हाथ में जाएगी।
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