कॉर्पोरेट स्वायत्तता बनाम रेगुलेटरी नियम
नई दिल्ली: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी ‘टाटा संस’ (Tata Sons’) को शेयर बाजार में लिस्ट करने के मुद्दे पर टाटा ट्रस्ट्स के भीतर दो फाड़ हो गए हैं। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा इस लिस्टिंग के कड़े खिलाफ हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि सार्वजनिक होने से समूह पर ट्रस्ट का नियंत्रण कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह जैसे प्रभावशाली ट्रस्टी पारदर्शिता और आरबीआई (RBI) के नियमों का पालन करने के लिए आईपीओ लाने के पक्ष में हैं। यह असहमति 8 मई को होने वाली बोर्ड मीटिंग में एक निर्णायक मोड़ ले सकती है।
आरबीआई का ‘सिस्टमैटिकली इम्पोर्टेन्ट’ नियम और समय सीमा
विवाद का मुख्य कारण भारतीय रिजर्व बैंक का वह सख्त नियम है, जिसके तहत 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक एसेट वाली ‘अपर-लेयर’ NBFC कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। टाटा संस इसी श्रेणी में आती है और उसके पास 1 जुलाई 2026 तक का समय है। हालांकि टाटा समूह ने पहले भी कर्ज पुनर्गठन के जरिए इस लिस्टिंग को टालने की कोशिश की थी, लेकिन आरबीआई द्वारा नियमों में ढील देने की कम संभावनाओं को देखते हुए अब समूह के पास विकल्प सीमित हो गए हैं।
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मिस्त्री परिवार और शापूरजी पालोनजी ग्रुप पर प्रभाव
टाटा संस की लिस्टिंग का सबसे बड़ा लाभ शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप और शापूर मिस्त्री को होने की उम्मीद है। मिस्त्री परिवार के पास टाटा संस की 18.4% हिस्सेदारी है, जो वर्तमान में ‘अनलिस्टेड’ होने के कारण आसानी से बेची नहीं जा सकती। लिस्टिंग होने से इस हिस्सेदारी की वास्तविक मार्केट वैल्यू अनलॉक हो जाएगी, जिससे भारी कर्ज में डूबे SP ग्रुप को अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने और ऋण चुकाने में बड़ी मदद मिलेगी।
नोएल टाटा टाटा संस की लिस्टिंग का विरोध क्यों कर रहे हैं?
नोएल टाटा का मानना है कि टाटा संस को एक निजी यानी ‘क्लोजली हेल्ड’ कंपनी ही रहना चाहिए। उन्हें अंदेशा है कि शेयर बाजार में लिस्ट होने से कंपनी के कामकाज में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ेगा और टाटा ट्रस्ट्स का ग्रुप की कंपनियों पर जो एकाधिकार और नियंत्रण है, वह कम हो सकता है।
आरबीआई टाटा संस को ‘शैडो बैंक’ (NBFC) क्यों मानता है?
टाटा संस एक होल्डिंग कंपनी है जो अपनी विभिन्न सहायक कंपनियों (जैसे TCS, टाटा मोटर्स) में निवेश करती है और वित्तीय गतिविधियों का संचालन करती है। आरबीआई के अनुसार, ऐसी बड़ी निवेश कंपनियां जो बैंकिंग लाइसेंस के बिना बड़े पैमाने पर वित्तीय प्रभाव रखती हैं, उन्हें ‘सिस्टमैटिकली इम्पोर्टेन्ट’ NBFC माना जाता है क्योंकि उनके वित्तीय स्वास्थ्य का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
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