Latest News-Andhra-Karnataka : गदी लिंगेश्वर स्वामी मंदिर

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आंध्र-कर्नाटक
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यहां पूरे गांव का एक ही नाम, क्या है इसके पीछे की कहानी?

आंध्र-कर्नाटक बॉर्डर के पास एक ऐसा गांव स्थित है, जहां सभी का नाम जैसा ही है. इसके पीछे ऐतिहासिक कारण छिपे हुए हैं, जिसे गांव वाले पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं. यहां कार्यक्रम या फिर समारोह में किसी एक को बुलाना चुनौती से कम नहीं है. गांव में सभी का नाम एक ही होना और इसकी पीछे की कहानी लोगों को अपनी ओर आकर्षण करती है

आंध्र-कर्नाटक सीमा क्षेत्र एक पवित्र स्थान है, जहां वेदवती नदी (Vedavati River) बहती है. इस पवित्र स्थान के सबसे पास गुल्यम गांव है. इसी गांव में, अवधूतों के रूप में मानव रूप धारण करने वाले गदी लिंगेश्वर और सिद्ध लिंगेश्वर स्वामी गुरु के शिष्य थे, जो कि भेड़ चराया करते थे. वे नदी के किनारे रहते थे. इस दौरान उन्होंने न केवल गुल्यम गांव को बल्कि सीमावर्ती कर्नाटक के 20 गांवों के लोगों को भी अनेक महिमाएं दिखाईं. इसी कारण लोग उन्हें देवता मानकर पूजते थे।

गदी लिंगेश्वर में नाम रखने की परंपरा

समय के साथ, उनके भक्तों ने श्री गदी लिंगेश्वर (Gadi Lingeshwar) स्वामी की प्रतिमा बनवाई. वे श्रद्धा पूर्वक उनकी पूजा करते थे. यहां एक मंदिर में गदी लिंगेश्वर स्वामी विराजमान है, जहां बड़ी संख्या में पहुंचने वाले भक्त न सिर्फ उनकी पूजा करते हैं, बल्कि मनोकामनाएं भी मांगते हैं।

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गदी लिंगेश्वर के नाम पर ही गांव में नाम रखने की एक परंपरा बना हुई हैं. सभी व्यक्तियों के नाम में गदी लिंगेश्वर शब्द जरूर हैं. ऐसा मानना है कि स्वामी जी का नाम नहीं रखने पर गांव में आफतों का दौरा शुरु हो सकता है।

गांव में निकाली जाती रथयात्रा

बता दें कि जब भी गांव में कोई शुभ अवसर आता है या फिर गांव वाले किसी अन्य उद्देशय से इकट्ठा होते हैं, तो गद्दी नाम लेने पर दर्जनों लोग एक साथ पलट कर देखते हैं और सभी का एक ही सवाल होता है कि क्या आपने मुझे बुलाया? हर साल, श्री गद्दी लिंगेश्वर और सिद्ध लिंगेश्वर स्वामी के शिष्यों की ओर से एक रथयात्रा का भी आयोजन होता है।

एकलिंगजी का मंदिर किसने बनवाया?

इस मंदिर के निर्माणकाल व कर्ता के संबंध में कोई लिखित प्रमाण नहीं मिला है, परंतु जनश्रुति के अनुसार इसका निर्माण बप्पा रावल ने आठवीं शताब्दी के लगभग करवाया था।

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Surekha Bhosle

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Surekha Bhosle

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