वाशिंगटन,। 1 जनवरी 1979 अमेरिका-चीन रिश्तों के इतिहास में ये साल काफी अहम माना जाता है। ये वही साल था, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए थे। यह एक ऐतिहासिक मोड़ था, क्योंकि अमेरिका (America) ने बीजिंग को चीन (China) का वैध प्रतिनिधि माना था। इसके साथ ही ताइवान के साथ औपचारिक कूटनीतिक रिश्ते खत्म कर दिए थे।
सोवियत प्रभाव के संतुलन की रणनीति
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने इस रणनीति के तहत सोवियत संघ के प्रभाव को संतुलित करने की नीति अपनाई। इस बदलाव ने दोनों पक्षों के बीच व्यापार, वैज्ञानिक-सांस्कृतिक सहयोग और रणनीतिक समन्वय के रास्ते खोल दिए। यानी दोनों देशों के बीच औपचारिक रिश्तों की शुरुआत हो गई।
45 साल बाद फिर बदलता समीकरण
45 साल के बाद एक बार फिर पिछले चार सालों में अमेरिका-ताइवान और अमेरिका-चीन नीतियों में तेजी से उतार-चढ़ाव दिखा है।
ट्रंप के पहले कार्यकाल में ताइवान को मजबूत समर्थन
डोनाल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में ही अमेरिका ने ताइवान को बहुआयामी सैन्य और सुरक्षा समर्थन बढ़ाकर संबंधों को मजबूत किया। ताइवान को हथियार बेचे गए और उच्च स्तरीय संपर्क बढ़ गया। यह नीति कार्टर की नीति से बिल्कुल अलग और अधिक निर्णायक थी।
2025 में ट्रंप का बदला रुख—ताइवान पर नरमी, चीन से संवाद प्राथमिकता
साल 2025 में ट्रंप प्रशासन ने फिर से चीन के साथ संवाद को ताइवान के मुद्दे पर प्राथमिकता दी है। डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की दक्षिण कोरिया में मुलाकात और समझौते इसकी शुरुआत थे। व्यापार/custom समझौतों ने संकेत दिए कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं तनाव कम कर आर्थिक लाभ पर लौटना चाहती हैं। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच ताइवान पर फोन पर बातचीत हुई, और अब यह तय हो गया है कि ट्रंप चीन की यात्रा करेंगे जबकि शी जिनपिंग अगले साल अमेरिका आएंगे।
ये घटनाएं बताती हैं कि इस वक्त ट्रंप ताइवान पर किसी सख्त रुख में नहीं हैं। इस नए रुख की तीन विशेषताएँ हैं—व्यापार निर्भरता, टुकड़ों में सहमति और निजी राजनयिक पहल।
कार्टर और ट्रंप की नीतियों में मूल अंतर
जिमी कार्टर (Jimmy Carter) का फैसला चीन को वैश्विक व्यवस्था में शामिल करने और रूस के खिलाफ सामरिक संतुलन बनाने का था। मौजूदा स्थिति अलग है—2025 में ट्रंप की नीति ज्यादा आर्थिक लेनदेन और समिट डिप्लोमेसी पर आधारित है। किसी हद तक ट्रंप भी कार्टर के उद्देश्य यानी चीन के सामाजिक और आर्थिक समावेश की दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन आज की परिस्थिति भिन्न है—क्योंकि अब रूस और चीन एक साथ खड़े हैं।
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