India vs China semiconductor : वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर चिप्स की बढ़ती मांग के बीच भारत इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को चीन के विकल्प के रूप में एक अतिरिक्त मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से 2021 में 10 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर प्रोत्साहन योजना की घोषणा की गई थी।
इस दिशा में एक अहम कदम के तौर पर गुजरात स्थित केन्स सेमिकॉन कंपनी ने हाल ही में अमेरिका के कैलिफोर्निया में अपने पहले चिप मॉड्यूल्स की खेप भेजी। जापान और मलेशिया की तकनीकी कंपनियों के सहयोग से यह परियोजना केंद्र सरकार की सहायता से शुरू की गई है।
गुजरात में ही भारत की पहली व्यावसायिक सेमीकंडक्टर फाउंड्री का निर्माण भी जारी है। लगभग 11 अरब डॉलर की इस परियोजना में टाटा समूह और ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन (PSMC) साझेदार हैं। अमेरिकी कंपनी इंटेल को इस फाउंड्री के संभावित ग्राहक के रूप में जोड़ा गया है।
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यह फाउंड्री 28 नैनोमीटर से 110 नैनोमीटर तक की (India vs China semiconductor) ‘मैच्योर चिप्स’ का निर्माण करेगी, जिनका उपयोग उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और पावर डिवाइसेज़ में होता है। हालांकि, अत्याधुनिक 7nm और 3nm जैसी तकनीकों में भारत अभी अमेरिका और ताइवान से पीछे है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, केंद्र और राज्य सरकारों का सहयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी इसके प्रमुख कारण हैं। फिर भी, वैश्विक चिप रेस में अमेरिका, ताइवान और चीन की बराबरी करने के लिए भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना होगा।
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