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USA के इशारे पर Pakistan बिगाड़ रहा एशिया का संतुलन, अब क्या करेगा चीन?

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USA के इशारे पर Pakistan बिगाड़ रहा एशिया का संतुलन, अब क्या करेगा चीन?

नई दिल्ली, 12 अगस्त 2025: दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच बढ़ती नजदीकियाँ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर सवाल उठा रही हैं। हाल ही में पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर (Asim Muneer) की अमेरिका यात्रा और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के साथ उनकी मुलाकात ने न केवल भारत, बल्कि चीन को भी असहज कर दिया है

लंबे समय से चीन का “सदाबहार सहयोगी” रहा पाकिस्तान अब वाशिंगटन की ओर झुकता नजर आ रहा है। सवाल उठता है कि क्या चीन अपने इस रणनीतिक साझेदार की इस नई दोस्ती को बर्दाश्त करेगा, या इससे एशिया में शक्ति संतुलन डगमगा जाएगा?

आसिम मुनीर और ट्रंप की मुलाकात: एक नया समीकरण

आसिम मुनीर ने हाल के महीनों में दो बार अमेरिका का दौरा किया, जिसमें ट्रंप के साथ उनकी गर्मजोशी भरी मुलाकात ने सुर्खियाँ बटोरीं। ट्रंप ने मुनीर को व्हाइट हाउस में मेहमान बनाया, जबकि चुनी हुई सरकार के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को कोई तवज्जो नहीं दी गई। ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप ने पाकिस्तानी सेना को “पालतू” बनाते हुए कई रियायतें दीं।

पाकिस्तानी सामानों पर टैरिफ को 29% से घटाकर 19% कर दिया गया और बलूचिस्तान में तेल खनन के लिए अमेरिकी कंपनियों को बड़ा मौका दिया गया। इसके अलावा, ट्रंप ने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश की, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया। इन घटनाक्रमों ने पाकिस्तान के पारंपरिक सहयोगी चीन को सतर्क कर दिया है।

चीन की चिंता और रणनीतिक हित

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत बीजिंग ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश किया है। ग्वादर बंदरगाह और अन्य रणनीतिक परियोजनाएँ चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं। चीनी रणनीतिकारों का मानना है कि ट्रंप का “राजनीतिक शोर” और उनकी डीलमेकिंग नीति पाकिस्तान को लंबे समय तक चीन से दूर नहीं कर सकती।

पाकिस्तान की आर्थिक और सैन्य निर्भरता बीजिंग पर बनी रहेगी। हालाँकि, जुलाई में मुनीर के बीजिंग दौरे पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनसे मुलाकात नहीं की, जो चीन की नाराजगी का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पाकिस्तान अमेरिका के साथ सैन्य ठिकानों की साझेदारी या रणनीतिक गठजोड़ की ओर बढ़ता है, तो यह चीन के लिए अस्वीकार्य होगा।

पाकिस्तान की दोहरी चाल

पाकिस्तान ने हमेशा दोहरी नीति अपनाई है। एक ओर वह चीन के साथ अपनी “आयरन ब्रदर” की छवि बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी ओर ट्रंप की नीतियों का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। बलूचिस्तान में खनन और क्रिप्टो डील में अमेरिकी कंपनियों को शामिल करना इसका उदाहरण है।

लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, जो भारी कर्ज के बोझ तले दबी है, और उसकी सैन्य ताकत, जो चीनी हथियारों पर निर्भर है, उसे बीजिंग से दूर जाने की इजाजत नहीं देती। CPEC के तहत ग्वादर बंदरगाह और अन्य परियोजनाएँ चीन के लिए रणनीतिक रूप से इतनी महत्वपूर्ण हैं कि वह इस्लामाबाद पर दबाव बनाए रखेगा।

भारत के लिए चुनौतियाँ

पाकिस्तान-अमेरिका की नजदीकी भारत के लिए कई मायनों में चिंताजनक है। ट्रंप की कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश और अमेरिका-पाक सैन्य सहयोग की संभावना भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकती है। इसके अलावा, बलूचिस्तान में अमेरिकी निवेश से वहाँ की अस्थिरता बढ़ सकती है, जो भारत के हितों के खिलाफ है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कश्मीर पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा।

क्या डगमगा रहा है शक्ति संतुलन?

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की नीति चीन को घेरने और मध्य पूर्व में ईरान के प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान इस खेल में एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन चीन, जो क्षेत्र में अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के दम पर प्रभाव बनाए हुए है, आसानी से अपनी स्थिति नहीं छोड़ेगा। पाकिस्तान की दोहरी नीति अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन लंबे समय में उसकी निर्भरता चीन पर ही बनी रहेगी।

इस नई गठजोड़ ने दक्षिण एशिया में तनाव बढ़ा दिया है। भारत, चीन और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की नजर इस्लामाबाद के अगले कदम पर है। अगर पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को और गहरा किया, तो यह न केवल चीन के साथ उसके रिश्तों को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी बदल सकता है।

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