Hindi News: नवरात्रि में दिल्ली में मीट बैन की मांग: BJP विधायकों की अपील से सियासी तूफान, विपक्ष ने ठोका ध्रुवीकरण का आरोप

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meat ban in delhi?
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22 सितंबर 2025. शारदीय नवरात्रि के पहले दिन दिल्ली (Delhi) की सियासत में मीट बैन का मुद्दा छाया हुआ है। बीजेपी के विधायकों ने नवरात्रि के नौ दिनों तक नॉनवेज की बिक्री और परोसने पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग उठाई है, जिससे सियासी घमासान मच गया। शकूरबस्ती से विधायक करनैल सिंह और जंगपुरा से पूर्व विधायक तरविंदर सिंह मारवाह ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर यह मांग की। विपक्ष ने इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ करार देते हुए बीजेपी पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया

बीजेपी की दलील: ‘आस्था का सम्मान जरूरी’

करनैल सिंह ने तर्क दिया, “नवरात्रि हिंदुओं का पवित्र पर्व है। मांसाहारी भोजन की बिक्री और मंदिरों के पास मीट शॉप्स से श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत होती हैं।” उन्होंने डोमिनोज, केएफसी और मैकडॉनल्ड्स जैसी फास्ट-फूड चेन को चेतावनी दी कि नवरात्रि में नॉनवेज परोसने पर सख्त कार्रवाई होगी। मारवाह ने मांग की कि मांस की दुकानें और रेस्तरां अस्थायी रूप से बंद रहें। उनका कहना है कि मंदिरों के आसपास खुले में मांस बिक्री से सनातन धर्म की भावनाएं ठेस पहुंचती हैं। बीजेपी का दावा है कि यह कदम धार्मिक माहौल को शुद्ध रखेगा।

विपक्ष का पलटवार: ‘यह धार्मिक जबरदस्ती’

आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस ने इस मांग को ‘असंवैधानिक’ और ‘सांप्रदायिक’ बताया। AAP नेता ने तंज कसते हुए कहा, “नवरात्रि में मीट बैन, तो रमजान में इफ्तार पर क्या सलाह देंगे?” कांग्रेस ने बीजेपी पर वोट बैंक के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाया। सोशल मीडिया पर #NoMeatBan ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “व्रत हमारा, खाना तुम्हारा। अपनी पसंद क्यों थोप रहे हो?”

पहले भी उठ चुकी है मांग

यह कोई नया विवाद नहीं है। चैत्र नवरात्रि 2025 और शिव कांवड़ यात्रा के दौरान भी बीजेपी विधायकों ने ऐसी मांगें उठाई थीं। इंदौर में विश्व हिंदू परिषद ने भी नवरात्रि में मीट दुकानों पर रोक की बात कही। पिछले साल दिल्ली में कई मीट शॉप्स स्वेच्छा से बंद रहीं, लेकिन पूर्ण बैन लागू नहीं हुआ।

दिल्ली सरकार ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुद्दा सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है, खासकर जब अन्य समुदायों के त्योहारों से तुलना हो रही हो। क्या यह मांग सियासी हथकंडा है या आस्था की रक्षा? जवाब सरकार के अगले कदम पर निर्भर है।

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