भारत के अंतरिक्ष इतिहास में आज एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। (ISRO) का सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3, जिसे ‘बाहुबली’ कहा जाता है, ने सुबह 8:55 बजे अमेरिकी कंपनी (AST SpaceMobile) के नेक्स्ट-जेन कम्युनिकेशन सैटेलाइट BlueBird-6 के साथ उड़ान भरी। यह भारत के लॉन्च व्हीकल द्वारा अब तक उठाया गया सबसे भारी सैटेलाइट है, जिसका वजन लगभग 6,100 किलोग्राम है। ISRO के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन ने इसे भारत की भारी-भरकम और हाई-परफॉर्मेंस लॉन्च क्षमता का प्रमाण बताया।
क्यों कहलाता है LVM3 ‘बाहुबली’
LVM3 को इसकी ताकत, क्षमता और शानदार परफॉर्मेंस की वजह से ‘बाहुबली’ कहा जाता है।
- ऊंचाई: 43.5 मीटर
- कुल वजन: करीब 640 टन
- क्षमता: GTO में 4,200 किलोग्राम तक पेलोड, (LEO) में इससे भी अधिक भार उठाने में सक्षम
इस रॉकेट ने 2023 में चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचाकर भारत को अंतरिक्ष महाशक्ति देशों की कतार में खड़ा किया था।
7 में से 7 मिशन सफल
LVM3 अब तक अपने 7 मिशनों में 100% सफल रहा है। आज की उड़ान इसकी 8वीं उड़ान और तीसरा कमर्शियल मिशन है, जो ISRO की वैश्विक साख को और मजबूत करेगी।
BlueBird-6: क्यों है खास
BlueBird-6 सैटेलाइट टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक चमत्कार माना जा रहा है।
- 2200 वर्ग मीटर का विशाल phased-array antenna
- LEO में तैनात दुनिया का सबसे बड़ा एंटीना
- पुराने वर्जन से 10 गुना ज्यादा डेटा क्षमता
- सीधे स्मार्टफोन से कनेक्टिविटी (Direct-to-Mobile तकनीक)
- Starlink या OneWeb की तरह किसी खास डिश, टर्मिनल या ग्राउंड स्टेशन की जरूरत नहीं
इस सैटेलाइट से मोबाइल नेटवर्क की परिभाषा ही बदल सकती है।
भारत के लिए बड़ा बिजनेस मौका
इस लॉन्च से ISRO को मल्टी-बिलियन डॉलर स्पेस मार्केट में मजबूत मौजूदगी का संकेत मिला है। इसके साथ ही भारत अब SpaceX, Arianespace और Roscosmos जैसे वैश्विक दिग्गजों की सूची में मजबूती से खड़ा है।
इसरो का इतिहास क्या है?
इसरो (ISRO) का इतिहास भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की यात्रा है, जिसकी नींव डॉ. विक्रम साराभाई ने रखी; 1962 में INCOSPAR (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति) के रूप में शुरू होकर, इसका गठन 15 अगस्त, 1969 को ISRO के रूप में हुआ, जिसका लक्ष्य अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास करना था,
ISRO के जनक कौन हैं?
इसरो के जनक डॉ. विक्रम साराभाई (Dr. Vikram Sarabhai) हैं, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का ‘संस्थापक पिता’ (Father of Indian Space Program) माना जाता है,
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