नई दिल्ली। ऑनलाइन गेमिंग (Online Gaming) की बढ़ती लत एक गंभीर सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। इसका ताजा और दर्दनाक उदाहरण गाजियाबाद में सामने आया है, जहां तीन सगी बहनों ने एक टास्क-बेस्ड कोरियन ऑनलाइन गेम की लत के चलते आत्मघाती कदम उठा लिया।
गेम में इस कदर डूबीं कि दिनचर्या टूट गई
बताया जा रहा है कि तीनों बहनें ऑनलाइन गेम में इतनी उलझ चुकी थीं कि नहाना, खाना, स्कूल जाना और सोना जैसे जरूरी काम भी वे एक साथ और तय समय पर करने लगी थीं। उनकी पूरी दिनचर्या गेम के इर्द-गिर्द सिमट गई थी।
माता-पिता की फटकार के बाद उठाया खौफनाक कदम
परिजनों के अनुसार जब माता-पिता ने गेम खेलने से रोकने की कोशिश की और उन्हें डांटा, तो तीनों बहनों ने सामूहिक रूप से आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठा लिया। इस घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है।
एक्सपर्ट्स की राय: वर्चुअल दुनिया से कट जाते हैं बच्चे
मीडिया रिपोर्ट (Media Report) के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों को वास्तविक दुनिया से धीरे-धीरे काट देती है। लंबे समय तक वर्चुअल दुनिया में रहने से बच्चों में मानसिक दबाव, भय और अकेलेपन की भावना बढ़ने लगती है।
भावनाएं दबाने से बढ़ता है मानसिक तनाव
एक्सपर्ट्स के अनुसार जब बच्चे अपनी भावनाएं किसी के साथ साझा नहीं कर पाते, तो अंदर ही अंदर तनाव बढ़ता रहता है। यही मानसिक दबाव कई बार उन्हें ऐसे खतरनाक फैसले लेने के लिए मजबूर कर देता है। गाजियाबाद की घटना को इसी मानसिक और भावनात्मक दबाव का नतीजा माना जा रहा है।
इन कारणों से बढ़ता है खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों के पीछे कई वजहें होती हैं—
- माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी
- परिवार में भावनात्मक सहारे का अभाव
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम
- इंटरनेट पर मौजूद अनियंत्रित और नकारात्मक कंटेंट
असामान्य व्यवहार दिखे तो तुरंत हों सतर्क
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स (Mental Health Experts) सलाह देते हैं कि अगर बच्चा किसी ऑनलाइन गेम या चैलेंज में असामान्य रुचि दिखाने लगे, तो माता-पिता इसे हल्के में न लें। बच्चों से खुलकर बातचीत करना, बिना जज किए उनकी बात सुनना और उन्हें यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि वे किसी भी समस्या में अकेले नहीं हैं।
टास्क और चैलेंज को सच मान लेते हैं बच्चे
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कई बार बच्चे ऑनलाइन गेम्स में मिलने वाले टास्क या चैलेंज को वास्तविक जीवन की तरह लेने लगते हैं। वे इसके परिणामों को पूरी तरह समझ नहीं पाते और मानसिक दबाव में आकर खतरनाक फैसले कर बैठते हैं।
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समाज और परिवार दोनों की जिम्मेदारी
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि समाज और शिक्षा व्यवस्था की भी जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों के व्यवहार पर नजर रखी जाए और किसी भी असामान्य संकेत को समय रहते पहचाना जाए।
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