कोलकाता,। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के गवर्नरों की विधायी शक्तियों और उनकी सीमाओं से जुड़े फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत बैलेंस्ड नजरिया अपनाया है। बोस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गवर्नर या भारत के राष्ट्रपति के लिए कोई टाइमलाइन (Timeline) तय नहीं की जा सकती। इसका मतलब यह नहीं है कि गवर्नर किसी फाइल पर अनिश्चित काल तक बैठे रह सकते हैं। इसकी देरी की कोई वजह होनी चाहिए।
बंगाल राज्यपाल बोले—एक भी बिल लंबित नहीं
उन्होंने कहा कि तीन साल पहले सरकार और विधानसभा के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट की ओर से मंजूरी मिली है। राज्यपाल ने यह भी स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल में कोई बिल पेंडिंग नहीं है। कुछ बिल क्लैरिफिकेशन नोट्स के साथ सरकार को वापस भेजे गए हैं और हम जवाब का इंतजार कर रहे हैं। जवाब मिलने के बाद बिना देरी कार्रवाई की जाएगी।
तमिलनाडु विवाद से उठा मामला
बता दें, राज्यपाल की शक्ति और अधिकार से जुड़ा यह मुद्दा मूल रूप से तमिलनाडु से उठा था, जहां आरोप थे कि राज्यपाल ने तमिलनाडु सरकार (Tamilnadu Government) के बिलों को अपने पास अटका कर रखा था। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने 8 अप्रैल के फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट किया कि गवर्नर या राष्ट्रपति के लिए कोई तय समय सीमा नहीं हो सकती।
संविधान पीठ का सर्वसम्मति से फैसला
सीजेआई बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदुरकर की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि पिछली टाइमलाइन वाली व्यवस्था गवर्नर और राष्ट्रपति की शक्तियों का अतिक्रमण थी, और संविधान में मौजूद फ्लेक्सिबिलिटी के खिलाफ थी।
गवर्नर के तीन ही संवैधानिक विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी राज्यपाल के पास यह अधिकार नहीं है कि वे किसी विधेयक को बिना निर्णय लिए लंबित रखें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिल पर गवर्नर के तीन ही संवैधानिक विकल्प हैं—
- विधेयक को मंजूरी देना,
- राष्ट्रपति के पास भेजना,
- या विधानसभा को वापस भेजना।
कोर्ट ने कहा कि बिना फैसला लिए बिल रोककर रखना संविधान की मंशा के खिलाफ है।
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