हैदराबाद। तेलंगाना विधानसभा में पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के न्यायिक प्रतिनिधित्व को लेकर एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल 2026 पर चर्चा हुई। मंत्री पोन्नम प्रभाकर ने कहा कि एससी (SC), एससी, बीसी (BC) और अल्पसंख्यक वर्गों से न्यायधीशों की संख्या को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार को तत्काल कदम उठाने चाहिए। मंत्री ने इस दौरान कहा कि एससी, एससी, बीसी औऔर अल्पसंख्यक वर्गों से न्यायधीशों की नियुक्ति अनिवार्य हो। पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार ने इन वर्गों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति में नाकाफी प्रयास किए हैं।
बीजेपी नेता मुफ्त कानूनी सलाह देने में अग्रणी
न्यायिक प्रणाली में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए केंद्र को मार्गदर्शन देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बीजेपी नेता मुफ्त कानूनी सलाह देने में अग्रणी हैं, लेकिन जब सत्ता में आते हैं तो समान अवसर नहीं देते कांग्रेस पार्टी और विशेष रूप से राहुल गांधी भविष्य में न्यायिक व्यवस्था में एससी, एससी, बीसी और अल्पसंख्यक वर्गों को समान अवसर देने का वचन देती है। 10% आरक्षण लागू करने पर किसी ने विरोध नहीं किया, इसलिए न्यायपालिका में भी समान अवसर दिए जाने चाहिए। मंत्री ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों को अवसर देने से समानता और न्याय सुनिश्चित होगा, और यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक साबित होगा।
एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल क्या है?
यह प्रस्तावित कानून वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया जाता है। इसके तहत अदालत परिसर या ड्यूटी के दौरान अधिवक्ताओं पर हमले, धमकी या दुर्व्यवहार को अपराध माना जाता है। इसमें दोषियों के खिलाफ कड़ी सजा और मुआवजा देने का प्रावधान भी शामिल होता है। कई राज्यों में इसे लागू करने की मांग लंबे समय से की जा रही है, ताकि वकील सुरक्षित वातावरण में अपना कार्य कर सकें।
यूपी में एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट क्या है?
उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए अलग से व्यापक कानून की मांग की जाती रही है, लेकिन अभी तक पूर्ण रूप से लागू अधिनियम नहीं है। कुछ मामलों में सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई होती है। प्रस्तावित व्यवस्था में वकीलों पर हमले को गैर-जमानती अपराध बनाने, त्वरित जांच और विशेष सुरक्षा प्रावधान शामिल करने की बात कही जाती है, जिससे उनके पेशेवर अधिकारों की रक्षा हो सके।
एडवोकेट एक्ट की धारा 30 क्या कहती है?
यह प्रावधान अधिवक्ताओं को पूरे भारत में किसी भी न्यायालय, ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण के समक्ष वकालत करने का अधिकार देता है। इसका मतलब है कि एक पंजीकृत अधिवक्ता देश के किसी भी हिस्से में अपनी सेवाएं दे सकता है। हालांकि यह अधिकार बार काउंसिल में नामांकन और वैध प्रैक्टिस लाइसेंस के अधीन होता है, जिससे पेशे में एकरूपता और वैधानिक व्यवस्था बनी रहती है।
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