उच्च उत्पादन और बाजार में मांग वाली किस्में ही उपलब्ध कराने के निर्देश
हैदराबाद। राज्य के कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव (Tummala Nageswara Rao) ने आगामी खरीफ (वर्षा) सीजन में बोई जाने वाली धान की महीन किस्मों (सन्ना वेरायटी) को लेकर उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि किसानों के लिए केवल वही बीज उपलब्ध कराए जाएं, जिनकी बाजार में मांग हो और जिनसे अधिक उत्पादन प्राप्त हो सके। सचिवालय में आयोजित इस बैठक में कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों तथा किसान आयोग के अध्यक्ष कोदंड रेड्डी समेत अन्य सदस्यों ने भाग लिया। अधिकारियों (Officials) ने बताया कि आगामी सीजन के लिए बीपीटी-5024, आएनआर-15048, एचएमटी सोना, जय श्रीराम, केएनएम-1638, डब्लूजीएल-44, डब्लूजीएल -962, जेजीएल-1798 समेत कई किस्मों को तैयार किया गया है।
किसानों को विपणन में कठिनाइयों का करना पड़ा सामना
मंत्री ने कहा कि पिछले वर्ष अधिक किस्में उपलब्ध कराने के कारण किसानों को विपणन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और कुछ को बोनस भी नहीं मिल सका। इस वर्ष ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए सीमित और बेहतर किस्मों पर ही ध्यान केंद्रित किया जाए। उन्होंने सिविल सप्लाई विभाग के साथ समन्वय बनाकर बीज आपूर्ति की ठोस योजना तैयार करने के निर्देश दिए। मंत्री ने बताया कि “प्रजा पालना-प्रगति” कार्यक्रम के तहत 4 से 9 मई तक आयोजित होने वाले किसान उत्सवों में 4 मई को इन बीजों के संबंध में विशेष जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे। साथ ही 15 मई तक चयनित बीज किसानों को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए।
निजी कंपनियां भी इन्हीं किस्मों के बीज उपलब्ध कराएं
उन्होंने यह भी कहा कि सीड कॉरपोरेशन के साथ-साथ निजी कंपनियां भी इन्हीं किस्मों के बीज उपलब्ध कराएं। इसके लिए बीज कंपनियों के साथ विशेष बैठक आयोजित करने को कहा गया है। इस दौरान मंत्री ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि केंद्र केवल एमएसपी घोषित करता है, लेकिन खरीद की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ देता है, जिससे राज्यों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। उन्होंने मांग की कि एमएसपी घोषित सभी फसलों की खरीद केंद्र सरकार स्वयं करे।
वैज्ञानिक आधार पर नहीं हो रहा है एमएसपी निर्धारण
किसान आयोग के अध्यक्ष कोदंड रेड्डी ने भी कहा कि एमएसपी निर्धारण वैज्ञानिक आधार पर नहीं हो रहा है और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे किसानों को नुकसान हो रहा है। मंत्री ने कहा कि तेलंगाना जैसे राज्यों में किसानों को समर्थन मूल्य दिलाने के लिए सरकार को खुद खरीद करनी पड़ती है, जिससे हर वर्ष 2000 से 3000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ता है, जबकि केंद्र से कोई सहयोग नहीं मिलता। बैठक में कृषि विभाग के सचिव सुरेंद्र मोहन, वैज्ञानिकों और अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
रबी और खरीफ की फसल कब होती है?
रबी फसलें सर्दियों के मौसम में बोई जाती हैं, आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच, और मार्च से अप्रैल तक काटी जाती हैं। गेहूं, चना, सरसों और जौ इसकी प्रमुख फसलें हैं। खरीफ फसलें बारिश के मौसम में जून से जुलाई के बीच बोई जाती हैं और सितंबर से अक्टूबर तक काटी जाती हैं। धान, मक्का, बाजरा, कपास और सोयाबीन खरीफ की मुख्य फसलें मानी जाती हैं।
खरीफ सीजन में कौन सी फसलें?
बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों को खरीफ फसलें कहा जाता है। इनमें धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, कपास, सोयाबीन, मूंगफली, अरहर और तिल प्रमुख हैं। इन फसलों को अच्छी वृद्धि के लिए पर्याप्त वर्षा और गर्म मौसम की आवश्यकता होती है। किसान मानसून की शुरुआत के साथ इनकी बुवाई करते हैं, इसलिए यह खेती भारतीय कृषि का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
खरीफ का महीना कौन सा है?
यह मौसम सामान्यतः जून से अक्टूबर तक माना जाता है। मानसून की शुरुआत के साथ जून–जुलाई में खरीफ फसलों की बुवाई की जाती है और सितंबर–अक्टूबर तक कटाई होती है। इस समय वर्षा अधिक होती है, जो धान, मक्का और कपास जैसी फसलों के लिए बहुत लाभदायक होती है। इसलिए खरीफ का संबंध मुख्य रूप से वर्षा ऋतु और गर्म जलवायु से माना जाता है।
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