10 हफ्ते में ₹1 लाख करोड़ का भारी नुकसान
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 50% तक का उछाल आया है। इसके बावजूद, भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम पिछले दो सालों से स्थिर बने हुए हैं। आम जनता को महंगाई की मार से बचाने के लिए सरकारी तेल कंपनियाँ (IOC, BPCL, HPCL) (Oil Companies) खुद भारी वित्तीय बोझ उठा रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, इन कंपनियों को पिछले 10 हफ्तों में ₹1 लाख करोड़ से अधिक का घाटा हो चुका है, जो औसतन ₹1,700 करोड़ प्रतिदिन बैठता है।
सरकार की रणनीति और ड्यूटी में कटौती
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, जिसमें 40% कच्चा तेल और 90% एलपीजी शामिल है। जहाँ ब्रिटेन और जापान जैसे देशों ने ईंधन की कीमतों में 30% तक की वृद्धि कर दी है, वहीं भारत सरकार ने एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) घटाकर कीमतों को नियंत्रित रखा है। वर्तमान में पेट्रोल पर ड्यूटी ₹13 से घटाकर ₹3 कर दी गई है और डीजल पर इसे शून्य कर दिया गया है। इस कटौती के कारण सरकार खुद हर महीने ₹14,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ वहन कर रही है।
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भविष्य की चुनौतियाँ और वित्तीय दबाव
लगातार हो रहे नुकसान का सीधा असर तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर पड़ रहा है। कमाई कम होने और लागत बढ़ने के कारण अब इन कंपनियों को दैनिक कार्यों (Working Capital) के लिए कर्ज लेना पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो भविष्य के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स जैसे क्लीन फ्यूल मिशन और रिफाइनिंग विस्तार की गति धीमी हो सकती है। अब सारा दारोमदार केंद्र सरकार के राजनीतिक फैसले पर है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी कब और कितनी की जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बाद भी भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा क्यों नहीं हुआ?
भारत सरकार ने आम उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में भारी कटौती की है। इसके अलावा, सरकारी तेल कंपनियाँ घाटा सहकर भी पुराने रेट पर ईंधन बेच रही हैं, ताकि घरेलू बाजार में स्थिरता बनी रहे।
तेल कंपनियों को हो रहे इस घाटे का दीर्घकालिक असर क्या हो सकता है?
भारी घाटे के कारण कंपनियों की निवेश क्षमता कम हो सकती है। इससे नए इंफ्रास्ट्रक्चर, रिफाइनरी के विस्तार और पर्यावरण अनुकूल ईंधन (Clean Fuel) से जुड़े प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है, जिससे देश की भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
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