गिरावट की मुख्य वजह: कच्चा तेल और विदेशी निवेशकों का पलायन
नई दिल्ली: भारतीय रुपए(Rupee) में आई इस रिकॉर्ड गिरावट का सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उछाल है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे महत्वपूर्ण सप्लाई रूट पर संकट गहरा गया है, जिससे ब्रेंट क्रूड $110 प्रति बैरल के पार चला गया है। भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है, जिसके भुगतान के लिए डॉलर की मांग बढ़ने से रुपए की वैल्यू कम हो गई है। साथ ही, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजार से लगभग $8 अरब निकाल लिए हैं, जिससे घरेलू मुद्रा पर दबाव और बढ़ गया है।
आम जनता पर मार: महंगा आयात और बढ़ती महंगाई
रुपए(Rupee) के कमजोर होने का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। चूंकि भारत को कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य मशीनरी के लिए डॉलर में अधिक भुगतान करना होगा, इसलिए देश में पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ मोबाइल और लैपटॉप जैसे विदेशी सामान महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा, जो छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए फीस और रहने का खर्च बढ़ जाएगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि ऊर्जा की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो देश की जीडीपी ग्रोथ सुस्त पड़ सकती है और महंगाई को काबू करना मुश्किल हो जाएगा।
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निर्यातकों के लिए अवसर: आईटी और फार्मा सेक्टर को लाभ
हालांकि रुपया गिरना अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, लेकिन यह भारतीय निर्यातकों के लिए चांदी काटने का मौका भी है। आईटी, फार्मा और कपड़ा उद्योग जैसी कंपनियां जो अपनी सेवाएं विदेश में बेचती हैं, उन्हें भुगतान डॉलर में मिलता है। जब वे इस डॉलर को रुपए(Rupee) में बदलते हैं, तो उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा पैसे मिलते हैं। इससे इन कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है और वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
क्या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपए को बचाने के लिए कोई कदम उठा रहा है?
जी हां, आरबीआई लगातार विदेशी मुद्रा बाजार पर नजर बनाए हुए है। जब रुपए में भारी गिरावट आती है, तो आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) से डॉलर बेचकर बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ाता है, जिससे रुपए की गिरती कीमत को संभालने में मदद मिलती है।
‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में तनाव का रुपए से क्या संबंध है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव की स्थिति से तेल की सप्लाई बाधित होने का डर रहता है। सप्लाई कम होने की आशंका से तेल की कीमतें बढ़ती हैं, जिसका सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल और रुपए की कीमत पर पड़ता है।
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