नई दिल्ली,। भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की बहुचर्चित आत्मकथा फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हालिया तथ्यों के अनुसार, बीते पांच वर्षों में सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गई लगभग सभी पुस्तकों को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन जनरल नरवणे (General Naravane) की किताब अब भी रक्षा मंत्रालय की समीक्षा प्रक्रिया में अटकी हुई है।
लोकसभा में उठ चुका है किताब का मुद्दा
यह वही पुस्तक है, जिसका उल्लेख लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने किया था। इसके बाद यह मामला राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस का विषय बन गया था और तब से इस पर नजरें टिकी हुई हैं।
आरटीआई से सामने आए अहम आंकड़े
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2020 से 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय के पास कुल 35 पुस्तकों के शीर्षक अनुमोदन के लिए भेजे गए थे। इनमें से 32 पुस्तकों को मंजूरी दी जा चुकी है।
अन्य लंबित किताबों को मिली हरी झंडी
लंबित सूची में शामिल पूर्व सेना प्रमुख जनरल एन.सी. विज की अलोन इन द रिंग (Alone in the Ring) और ब्रिगेडियर जीवन राजपुरोहित की पुस्तक को भी अब अनुमति मिल चुकी है। वर्तमान में जनरल नरवणे की किताब ही इकलौती पांडुलिपि है, जो अभी भी विचाराधीन है।
सेना प्रमुख रहते अहम दौर का रहा हिस्सा
जनरल नरवणे ने 2019 से 2022 तक भारतीय सेना के प्रमुख के रूप में सेवा दी। उनके कार्यकाल के दौरान पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ गंभीर तनाव की स्थिति बनी थी।
किताब के अंशों ने छेड़ी थी बहस
दिसंबर 2023 में जब इस आत्मकथा के कुछ अंश सामने आए थे, तब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर नई बहस छिड़ गई थी। विपक्ष का दावा है कि पुस्तक में 31 अगस्त 2020 की उस रात का जिक्र है, जब चीनी टैंक रेचिन ला क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे।
‘हॉट पोटैटो’ वाले बयान पर विवाद
कथित तौर पर किताब में लिखा गया है कि उस चुनौतीपूर्ण रात रक्षा मंत्री से बातचीत के दौरान जनरल नरवणे को एक “हॉट पोटैटो” सौंपा गया था, जिससे संकेत मिलता है कि तत्काल बड़े सैन्य फैसले लेने की जिम्मेदारी उन पर आ गई थी।
संवेदनशील खुलासों के चलते समीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि लद्दाख गतिरोध और सरकार के साथ सैन्य संवाद से जुड़े इन संवेदनशील विवरणों के कारण ही रक्षा मंत्रालय इस पांडुलिपि की बेहद बारीकी से जांच कर रहा है।
अन्य अधिकारियों की किताबों को मिली अनुमति
जहां लेफ्टिनेंट जनरल एस.ए. हसनैन और मेजर जनरल जी.डी. बख्शी जैसे अधिकारियों की पुस्तकों को मंजूरी मिल चुकी है, वहीं नरवणे की किताब पर जारी देरी सवाल खड़े कर रही है।
सरकार और विपक्ष आमने-सामने
सरकार का कहना है कि वह पूर्व सेना प्रमुख का पूरा सम्मान करती है और प्रक्रिया नियमों के तहत चल रही है। वहीं विपक्ष इस देरी को सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का मुद्दा बना रहा है।
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मंत्रालय और प्रकाशक की चुप्पी
फिलहाल रक्षा मंत्रालय और प्रकाशक दोनों ही इस मामले पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी करने से बच रहे हैं।
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