Hyderabad : भारत को 2030 तक मलेरिया मुक्त बनाने की दिशा में तेज़ी

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मलेरिया
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हैदराबाद। विश्व मलेरिया दिवस (World Malaria Day) के अवसर पर अटल इनक्यूबेशन सेंटर–सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी ने कॉन्साइटेल लाइफसाइंसेज़ के सहयोग से एक उच्चस्तरीय बहु-हितधारक संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी में अकादमिक जगत, सार्वजनिक स्वास्थ्य, उद्योग और सरकार से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लेकर वर्ष 2030 तक भारत को मलेरिया मुक्त बनाने की रणनीति पर विस्तृत चर्चा की। कार्यक्रम में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ कॉम्प्लेक्स मलेरिया इन इंडिया, भारत बायोटेक (Bharat Biotech), पीएचएफआई-इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ साइंसेज़, गांधी मेडिकल कॉलेज तथा सीएसआईआर-सीसीएमबी के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

विशेषज्ञों ने ‘लास्ट माइल’ चुनौतियों पर किया मंथन

सत्र का उद्घाटन करते हुए सीएसआईआर-सीसीएमबी के निदेशक डॉ. विनय के. नंदीकोरी ने कहा कि मलेरिया के जैविक पहलुओं को समझने में संस्थान अग्रणी भूमिका निभा रहा है, किंतु इस बीमारी के खिलाफ अंतिम लड़ाई सामूहिक संकल्प से ही जीती जा सकती है, ताकि कोई भी व्यक्ति इससे अछूता न रहे। भारत ने पिछले वर्षों में मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के ‘हाई बर्डन टू हाई इम्पैक्ट’ समूह से बाहर निकल चुका है। इसके बावजूद ‘लास्ट माइल’ की चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। इनमें आदिवासी एवं वन क्षेत्रों में संक्रमण का बने रहना, परजीवी के बदलते स्वरूप, जलवायु परिवर्तन के कारण रोग के फैलाव में बदलाव तथा नवीन तकनीकों की आवश्यकता प्रमुख हैं।

मलेरिया टीकों की बदलती भूमिका जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने रखे अपने विचार

संगोष्ठी में ओडिशा के सफल ‘डामन’ कार्यक्रम जैसे राज्य स्तरीय प्रयासों से सीख, सुप्त परजीवी के पुनः सक्रिय होने की समस्या, निदान में प्रतिरोध, यकृत-केंद्रित वनस्पति आधारित औषधीय नवाचार तथा मलेरिया टीकों की बदलती भूमिका जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। एआईसी-सीसीएमबी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. नलम मधुसूदन राव ने कहा कि भारत में मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट आई है और इस क्षेत्र में निवेश का आर्थिक लाभ भी अत्यधिक है। अब समय आ गया है कि अंतिम चरण की चुनौतियों को दूर करने के लिए नवाचार को प्राथमिकता दी जाए। कॉन्साइटेल लाइफसाइंसेज़ के संस्थापक डॉ. एस. के. दाश ने मलेरिया उन्मूलन के लिए मानव शरीर में परजीवी के भंडार को समाप्त करने पर जोर देते हुए नवीन औषधीय समाधानों की आवश्यकता बताई।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के उपयोग पर दिया बल

‘अब करना होगा: 2030 तक भारत के अंतिम चरण को पूरा करना’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने सुदृढ़ निगरानी तंत्र, सीमापार सहयोग, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लक्षित हस्तक्षेप तथा सतत राजनीतिक और वित्तीय प्रतिबद्धता को आवश्यक बताया। स्वास्थ्य मंत्रालय की वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अनुराधा मेडोजू ने मलेरिया के पूर्वानुमान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के उपयोग पर बल दिया। कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने समन्वित, समावेशी और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया, ताकि भारत वर्ष 2030 तक मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सके।

विश्व मलेरिया दिवस क्यों मनाया जाता है?

यह दिवस हर वर्ष 25 अप्रैल को मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को मलेरिया की रोकथाम, समय पर जांच और सही उपचार के बारे में जानकारी देना है। साथ ही सरकारों और स्वास्थ्य संस्थाओं को इस रोग के नियंत्रण के लिए लगातार प्रयास करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सदस्य देशों ने 2007 में मान्यता दी थी।

विश्व मलेरिया दिवस 2025 का विषय क्या है?

वर्ष 2025 के लिए विश्व मलेरिया दिवस का विषय था — “Malaria Ends With Us: Reinvest, Reimagine, Reignite”। इसका अर्थ है मलेरिया समाप्त करने के लिए फिर से निवेश करना, नई रणनीतियां अपनाना और प्रयासों को दोबारा मजबूत करना। इस विषय का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर लोगों, सरकारों और संस्थाओं को मलेरिया उन्मूलन के लिए एकजुट करना था।

मलेरिया रोग के जनक कौन थे?

मलेरिया परजीवी की खोज के कारण फ्रांसीसी वैज्ञानिक Alphonse Laveran को मलेरिया रोग का जनक माना जाता है। उन्होंने 1880 में मानव रक्त में मलेरिया परजीवी की पहचान की थी। बाद में यह सिद्ध हुआ कि यह रोग मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। उनके इस महत्वपूर्ण कार्य ने मलेरिया की समझ और उपचार में बड़ी भूमिका निभाई।

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Ajay Kumar Shukla

लेखक परिचय

Ajay Kumar Shukla

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