Hyderabad : पौधों ने वायरस से बचाव के लिए अपनाई “चिपचिपी जाल” रणनीति

Read Time:  1 min
वायरस
वायरस
FONT SIZE
GET APP

हैदराबाद। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के अंतर्गत केंद्र केन्द्रीय एवं आणविक जीव विज्ञान (सीसीएमबी) के वैज्ञानिकों ने पौधों में वायरस संक्रमण को रोकने की एक अत्यंत उन्नत रक्षा प्रणाली का पता लगाया है। इस शोध में सामने आया है कि पौधे “चिपचिपे प्रोटीन ड्रॉपलेट्स” (तरल संरचनाओं) के माध्यम से वायरस के आनुवंशिक पदार्थ को फँसा लेते हैं, जिससे संक्रमण फैलने से पहले ही रुक जाता है। यह महत्वपूर्ण अध्ययन डॉ. मंदर वी. देशमुख के नेतृत्व में किया गया है और इसे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ द अमेरिकन केमिकल सोसाइटी (JACS) में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन में बताया गया है कि पौधे वायरस के हमले के दौरान विशेष आरएनए-बाइंडिंग प्रोटीन बनाते हैं, जो वायरल आरएनए को पहचानकर उसकी प्रतिकृति प्रक्रिया को रोक देते हैं।

सीसीएमबी वैज्ञानिकों की बड़ी खोज

शोधकर्ताओं के अनुसार ये प्रोटीन वायरल प्रतिकृति केंद्रों के पास एकत्र होकर वायरस के बढ़ने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं। इससे वायरस का प्रसार रुक जाता है। अत्याधुनिक तकनीकों जैसे परमाणु चुंबकीय अनुनाद, फ्लोरेसेंस माइक्रोस्कोपी और आणविक सिमुलेशन के माध्यम से वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीनों की सतह पर विशेष विद्युत आवेश होते हैं, जो उन्हें “चिपचिपे” बनाते हैं। ये प्रोटीन आपस में जुड़कर जेल जैसी संरचना बनाते हैं, जिन्हें जैव-अणु संघनन कहा जाता है। शोध के प्रमुख लेखक डॉ. जयदीप पॉल ने बताया कि ये प्रोटीन एक प्रकार के आणविक गोंद की तरह कार्य करते हैं, जो वायरल आरएनए को फँसा लेते हैं और उसे प्रतिकृति मशीनरी तक पहुंचने से रोक देते हैं।

कोशिकाएं केवल स्थिर संरचनाओं से नहीं बनी होतीं

वैज्ञानिकों के अनुसार यह खोज इस धारणा को और मजबूत करती है कि कोशिकाएं केवल स्थिर संरचनाओं से नहीं बनी होतीं, बल्कि उनके भीतर तरल जैसी गतिशील सूक्ष्म संरचनाएं भी होती हैं। डॉ. देशमुख के अनुसार इस खोज का उपयोग कृषि और चिकित्सा दोनों क्षेत्रों में किया जा सकता है। इससे ऐसे फसलों के विकास की संभावना बढ़ेगी जो वायरस प्रतिरोधी हों और फसल नुकसान को कम किया जा सके। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि इस शोध के परिणाम मानव स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं, जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों और ट्यूमर से जुड़े अध्ययन में नई दिशा मिल सकती है।

वायरस की परिभाषा क्या है?

सूक्ष्म आकार का ऐसा संक्रामक कण जो केवल जीवित कोशिकाओं के भीतर ही बढ़ और फैल सकता है, उसे वायरस कहा जाता है। यह मानव, पशु, पौधों और अन्य जीवों में विभिन्न प्रकार की बीमारियां पैदा कर सकता है। सामान्य जीवाणुओं की तुलना में इसका आकार बहुत छोटा होता है। संक्रमण फैलने पर शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिक अध्ययन में इसे जैविक और चिकित्सकीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कई रोगों की रोकथाम के लिए टीके और दवाओं का उपयोग किया जाता है।

वायरस के लक्षण क्या होते हैं?

संक्रमण के प्रकार के अनुसार लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। सामान्य रूप से बुखार, खांसी, कमजोरी, शरीर दर्द, सिरदर्द, गले में खराश और थकान जैसी समस्याएं देखी जाती हैं। कुछ मामलों में उल्टी, दस्त या सांस लेने में कठिनाई भी हो सकती है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। समय पर जांच और उपचार जरूरी माना जाता है। स्वच्छता, संतुलित भोजन और सावधानी बरतने से संक्रमण का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है।

वायरस का जनक कौन था?

वैज्ञानिक Martinus Beijerinck को आधुनिक वायरस विज्ञान का जनक माना जाता है। उन्होंने 1898 में यह बताया था कि कुछ संक्रामक तत्व बैक्टीरिया से भी छोटे होते हैं और उन्हें “वायरस” नाम दिया। बाद में कई वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध किए। सूक्ष्मजीव विज्ञान और चिकित्सा के विकास में उनके कार्य को ऐतिहासिक महत्व दिया जाता है। आज वायरस पर होने वाले शोध स्वास्थ्य विज्ञान और रोग नियंत्रण के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

Read Telugu News: https://vaartha.com/

यह भी पढ़ें :

Ajay Kumar Shukla

लेखक परिचय

Ajay Kumar Shukla

सूचना : इस वेबसाइट पर प्रकाशित खबरें केवल पाठकों की जानकारी के उद्देश्य से दी जाती हैं। हम अपनी ओर से यथासंभव सही और सटीक जानकारी प्रदान करने का प्रयास करते हैं।