हैदराबाद/अमरावती। आंध्र प्रदेश के श्री तिरुपति गंगम्मा मंदिर (Sri Tirupati Gangamma Temple) में 18 और 19 मई को प्रस्तावित पशु बलि को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। वरिष्ठ सांसद और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका संजय गांधी ने इस मुद्दे पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। अपने पत्र में मेनका गांधी ने कहा कि सैकड़ों युवा नागरिकों, जिनमें डॉक्टर और प्रोफेसर भी शामिल हैं, ने इस पारंपरिक आयोजन (Traditional Events) में बड़े पैमाने पर होने वाली पशु बलि पर चिंता जताई है। उन्होंने इस प्रथा को “नरसंहार” बताते हुए दावा किया कि इसमें हजारों जानवरों की हत्या होती है और राज्य सरकार से इसे रोकने के लिए कदम उठाने की अपील की।
“प्रगतिशील और दूरदर्शी नेता” मुख्यमंत्री नायडू
उन्होंने मुख्यमंत्री नायडू को “प्रगतिशील और दूरदर्शी नेता” बताते हुए निर्णायक कार्रवाई करने का आग्रह किया। गांधी ने कहा कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने पशु बलि के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाई है, जबकि कर्नाटक में भी इस तरह की प्रथाओं पर काफी हद तक रोक लगाई गई है। भाजपा नेता ने तर्क दिया कि नई पीढ़ी ऐसे रीति-रिवाजों को तेजी से नकार रही है और यह हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा दे सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई लोग इसे धार्मिक आस्था के बजाय आक्रोश निकालने के माध्यम के रूप में करते हैं, कभी-कभी शराब के प्रभाव में भी। मेनका गांधी ने सुझाव दिया कि मंदिर प्रशासन पशु बलि के स्थान पर नारियल जैसे प्रतीकात्मक अर्पण को बढ़ावा दे सकता है।
कोई परंपरा लंबे समय से चली आ रही है, वह सही नहीं
उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर परिसर को शांतिपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने सती जैसी समाप्त हो चुकी प्रथाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि “सिर्फ इसलिए कि कोई परंपरा लंबे समय से चली आ रही है, वह सही नहीं हो जाती।” उल्लेखनीय है कि आयोजन की तारीखें नजदीक आने के साथ अब सभी की नजरें आंध्र प्रदेश सरकार पर टिकी हैं कि वह इस विवादित प्रथा को नियंत्रित या बंद करने के लिए क्या कदम उठाती है।
क्या हिंदू धर्म में पशु बलि की अनुमति है?
हिंदू परंपराओं में इस विषय पर एकमत राय नहीं है। कुछ शाक्त परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाजों में विशेष अवसरों पर पशु बलि का उल्लेख मिलता है, जबकि कई अन्य धाराएँ अहिंसा को सर्वोच्च मानते हुए इसका विरोध करती हैं। आज के समय में कई मंदिरों और समाजों ने प्रतीकात्मक भोग या नारियल/फल चढ़ाने की परंपरा अपना ली है। अलग-अलग राज्यों में कानून और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार इसका पालन बदलता है।
गीता पशु बलि के बारे में क्या कहती है?
Bhagavad Gita में सीधे तौर पर पशु बलि का समर्थन नहीं किया गया है। इसमें कर्म, भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर जोर दिया गया है, साथ ही संयम, करुणा और अहिंसा जैसे गुणों को महत्व दिया गया है। इसलिए इसे सामान्यतः हिंसा से दूर रहने और आत्मिक उन्नति पर केंद्रित ग्रंथ माना जाता है।
पशु बलि का मामला क्या है?
यह मुद्दा धार्मिक परंपराओं, कानून और पशु कल्याण के बीच संतुलन से जुड़ा होता है। कुछ स्थानों पर इसे परंपरा के रूप में माना जाता है, जबकि कई लोग और संगठन इसका विरोध करते हैं। भारत में अलग-अलग राज्यों में पशु क्रूरता से जुड़े कानून लागू हैं, जो इस प्रकार की प्रथाओं को नियंत्रित या प्रतिबंधित करते हैं। इसलिए यह विषय सामाजिक, कानूनी और धार्मिक दृष्टिकोण से चर्चा का विषय बना रहता है।
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