कंपनियों का बढ़ता घाटा और कीमतों का गणित
नई दिल्ली: विदेशी ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर(Fuel Shock) बने हुए हैं। इस वजह से तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर ₹18 और डीजल पर ₹35 का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वर्तमान(Present) में ये कंपनियां हर दिन लगभग ₹1,600 करोड़ का घाटा सह रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होते ही कंपनियां इस घाटे की भरपाई के लिए कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी कर सकती हैं।
कच्चे तेल का आयात और अर्थव्यवस्था पर असर
भारत(India) अपनी तेल जरूरतों का लगभग 88% हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिसमें रूस और मिडिल ईस्ट की बड़ी हिस्सेदारी है। कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर के उछाल से कंपनियों का नुकसान ₹6 प्रति लीटर तक बढ़ जाता है। तेल की ये बढ़ती कीमतें न केवल आम आदमी की जेब पर बोझ डालेंगी, बल्कि देश के चालू खाता घाटे (CAD) को भी प्रभावित करेंगी। अनुमान है कि 2026 की पहली तिमाही तक यह घाटा बढ़कर 20 अरब डॉलर के पार पहुंच सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर संकेत है।
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वैश्विक स्थिति और सरकार के पास विकल्प
केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। वहीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान और श्रीलंका भी पहले ही दाम बढ़ा चुके हैं। भारत सरकार के पास एक्साइज ड्यूटी घटाने का विकल्प सीमित है, क्योंकि सरकारी राजस्व में इसका योगदान पहले ही 22% से घटकर 8% रह गया है। स्थिति यह है कि यदि सरकार पूरी एक्साइज ड्यूटी भी हटा दे, तो भी तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह खत्म होना मुश्किल नजर आ रहा है।
तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर कितना नुकसान हो रहा है?
तेल कंपनियों को कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों के कारण पेट्रोल पर ₹18 प्रति लीटर और डीजल पर ₹35 प्रति लीटर का घाटा हो रहा है।
भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए किन देशों पर सबसे ज्यादा निर्भर है?
भारत अपनी जरूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से सबसे ज्यादा 45% मिडिल ईस्ट के देशों से और 35% रूस से आता है।
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