रसोई का बजट बिगड़ा: खाद्य तेल और FMCG पर असर
नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने से खाने के तेल(Iran) के दाम 7% तक बढ़ गए हैं। चूंकि भारत अपनी खाद्य तेल जरूरत का 57% आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का सीधा असर यहाँ पड़ता है। इसके अलावा, साबुन, बिस्किट और पेस्ट जैसे FMCG उत्पादों पर ‘श्रिंकफ्लेशन’ की मार पड़ी है। लागत बढ़ने के कारण कंपनियां कीमत बढ़ाने के बजाय पैकेट का वजन घटा रही हैं, जिससे उपभोक्ताओं को उतनी ही कीमत में कम सामान मिल रहा है।
महंगे हुए घरेलू उपकरण: फ्रिज, वॉशिंग मशीन और LED के बढ़े दाम
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर में उत्पादन लागत 10-15% तक बढ़ गई है। कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का 70% हिस्सा पहले ही ग्राहकों पर डाल चुकी हैं, जिससे फ्रिज, वॉशिंग मशीन, पंखे और LED बल्ब महंगे हो गए हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने प्लास्टिक उत्पादन की लागत को भी 50% तक बढ़ा दिया है, जिसका असर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बॉडी और पार्ट्स पर पड़ रहा है। गर्मी के मौसम में एसी (AC) की भारी मांग के बीच वोल्टास और ब्लू स्टार जैसी कंपनियों के शेयरों में भी हलचल देखी जा रही है।
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टेक्सटाइल और पेंट सेक्टर में बढ़ती महंगाई
कपड़ा उद्योग भी इस संकट से अछूता नहीं है। भारत के कपड़ा उत्पादन में 60% हिस्सेदारी सिंथेटिक फाइबर की है, जिसके लिए जरूरी नायलॉन और पॉलिएस्टर जैसे कच्चे माल 20-25% महंगे हो गए हैं। ईवाई (EY) की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में कपड़ों और पेंट की कीमतों में 2% से 5% तक की और बढ़ोतरी होने की संभावना है। कच्चे तेल के 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव्स की किल्लत हो गई है, जो पेंट और पर्सनल केयर उत्पादों के लिए अनिवार्य हैं।
‘श्रिंकफ्लेशन’ क्या है और तेल संकट के दौरान कंपनियां इसका उपयोग क्यों कर रही हैं?
श्रिंकफ्लेशन वह प्रक्रिया है जिसमें कंपनियां उत्पाद की कीमत बढ़ाए बिना उसके पैकेट का वजन या मात्रा कम कर देती हैं। लागत बढ़ने पर ग्राहकों को अचानक कीमत वृद्धि से बचाने और अपनी बिक्री बरकरार रखने के लिए FMCG कंपनियां ऐसा करती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर पर क्यों पड़ रहा है?
कच्चे तेल से कई प्रकार के केमिकल्स, प्लास्टिक, नायलॉन और पॉलिएस्टर बनते हैं। जब क्रूड महंगा होता है, तो सिंथेटिक फाइबर और प्लास्टिक पार्ट्स बनाने की लागत बढ़ जाती है, जिससे कपड़े और फ्रिज-वॉशिंग मशीन जैसे उपकरण महंगे हो जाते हैं।
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