US ने किया हैरतअंगेज़ कारनामा: 6,000 जीवित अप्रवासियों को ‘मृत’ घोषित कर भेजा स्व-निर्वासन के लिए नोटिस
US की अप्रवासी नीतियों को लेकर एक बार फिर से विवाद खड़ा हो गया है। इस बार मामला हैरान करने वाला है, क्योंकि अमेरिकी सरकार द्वारा लगभग 6,000 जीवित अप्रवासियों को मृत घोषित कर दिया गया, जिससे उन्हें स्व-निर्वासन (Self-Deportation) के लिए मजबूर किया जा सके।
यह खुलासा होते ही ना सिर्फ US बल्कि दुनिया भर में इस नीति की आलोचना हो रही है।
क्या है पूरा मामला?
एक जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) द्वारा भेजे गए कई डिपोर्टेशन नोटिस उन लोगों को भेजे गए हैं जिन्हें सिस्टम ने “मृत” घोषित कर दिया था, जबकि वे व्यक्ति ज़िंदा हैं और कई वर्षों से वैध रूप से US में रह रहे हैं।
इनमें से कुछ लोगों के पास वैध ग्रीन कार्ड और निवास के अन्य कानूनी दस्तावेज भी हैं।

सिस्टम की गलती या जानबूझकर रणनीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि एक जानबूझकर की गई रणनीति हो सकती है। कुछ वकीलों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं अप्रवासियों पर दबाव बनाने के लिए की जा रही हैं, ताकि वे डर कर खुद देश छोड़ दें।
एक अप्रवासी अधिकार संगठन के प्रवक्ता ने कहा:
“यह लोगों के अधिकारों का उल्लंघन है। किसी को बिना कानूनी प्रक्रिया के ‘मृत’ घोषित करना पूरी तरह अमानवीय है।”
पीड़ितों की कहानी
मेहुल पटेल, जो पिछले 14 वर्षों से टेक्सास में रह रहे हैं और आईटी कंपनी में काम करते हैं, उन्हें भी ऐसा नोटिस मिला। उन्होंने बताया:
“मैं जब नोटिस पढ़ा तो हिल गया। उसमें साफ लिखा था कि मैं मृत हूं और मेरी मौजूदगी अवैध है। मैंने तुरंत वकील से संपर्क किया।”
इसी तरह मारिया गोंजालेज, एक स्वास्थ्यकर्मी, को भी नोटिस मिला, जबकि वह हर साल टैक्स भरती हैं और अमेरिकी नागरिक बनने की प्रक्रिया में हैं।

सरकार की सफाई
DHS की ओर से दी गई प्रतिक्रिया में कहा गया:
“कुछ केसों में तकनीकी खामी के चलते गलत डाटा फीड हो गया है। हम इसकी समीक्षा कर रहे हैं।”
हालांकि, अभी तक इस पर कोई बड़ी कार्रवाई या माफ़ी नहीं दी गई है।
क्यों उठ रहे हैं सवाल?
- क्या यह डिजिटल सिस्टम फेलियर है या नीति आधारित निर्णय?
- क्या US अप्रवासियों को डराकर वापस भेजना चाहता है?
- क्या इससे US की मानवाधिकार छवि को ठेस पहुंचेगी?
मानवाधिकार संगठनों और मीडिया संस्थाओं ने अब इस मुद्दे को लेकर अमेरिकी प्रशासन से पारदर्शिता की मांग की है।