मुख्य बातें: –
- युद्ध के दौरान जहाजों की संख्या घटकर 19 रह गई थी
- कई तेल, एलपीजी और क्रूड ऑयल टैंकरों की आवाजाही हुई
- चीन, ओमान और जापान की ओर रवाना हुए बड़े तेल टैंकर
मध्य पूर्व में जारी तनाव और ईरान-अमेरिका टकराव के बीच वैश्विक तेल और गैस बाजार के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। रणनीतिक रूप से बेहद अहम (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों की संख्या में फिर तेजी आई है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 11 मई से 17 मई के बीच इस समुद्री मार्ग से करीब 55 मालवाहक जहाज गुजरे, जिनमें बड़ी संख्या तेल और गैस टैंकरों की रही।
युद्ध के दौरान घटकर रह गई थी आवाजाही
रिपोर्ट के अनुसार, संघर्ष के चरम दौर में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या घटकर सिर्फ 19 रह गई थी। यह युद्ध शुरू होने के बाद का सबसे निचला स्तर माना गया। गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल (America and Israel) द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया था। इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण कड़ा कर दिया था, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई थी।
तेल और गैस टैंकरों की बढ़ी आवाजाही
समुद्री निगरानी एजेंसियों के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले सप्ताह गुजरने वाले 55 जहाजों में लगभग आधे तेल और तरल पदार्थ ढोने वाले टैंकर थे। इनमें तीन बड़े क्रूड ऑयल टैंकर चीन, ओमान और जापान की ओर रवाना हुए। इसके अलावा 15 ड्राई बल्क जहाज और 16 एलपीजी टैंकर भी इस मार्ग से गुजरे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कतर से पाकिस्तान जा रहा एक एलएनजी जहाज 12 मई को इस मार्ग से सुरक्षित निकला। युद्ध शुरू होने के बाद अब तक केवल 8 एलएनजी जहाज ही इस रास्ते से गुजर पाए हैं।
धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हालात
ईरान की सरकारी मीडिया के अनुसार, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने हाल के दिनों में ज्यादा जहाजों को गुजरने की अनुमति दी है। हालांकि ईरानी अधिकारियों का कहना है कि हालात अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी की सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से होती है। इसलिए यहां की स्थिति का असर सीधे वैश्विक बाजार और ईंधन कीमतों पर पड़ता है।
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निगरानी बढ़ाने की तैयारी में ईरान
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर निगरानी और नियंत्रण बढ़ाने के लिए नई संस्था बनाने की घोषणा की है। यह संस्था जहाजों की आवाजाही, संचालन और शुल्क वसूली पर नजर रखेगी। हालांकि कई देशों को आशंका है कि ईरान इस कदम के जरिए इस अहम समुद्री मार्ग पर अपना प्रभाव और मजबूत करना चाहता है।
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