सैन्य कब्जे या खरीद की तैयारी से वैश्विक हड़कंप
वॉशिंगटन: व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट के हालिया बयान ने दुनिया(Trump) को चौंका दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी प्रशासन ग्रीनलैंड को अपनी सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानता है और इसे हासिल करने के लिए सैन्य बल (Military Force) के इस्तेमाल जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रहा है। ट्रम्प सरकार का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी अमेरिका के लिए बड़ा खतरा है। ट्रम्प ने संकेत दिया है कि अगले 20 दिनों के भीतर इस मुद्दे पर कोई बड़ा कदम उठाया जा सकता है।
डेनमार्क की संप्रभुता और रक्षा चुनौतियां
ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क का एक स्वायत्त हिस्सा है और नाटो (NATO) का सदस्य भी है। रक्षा के मोर्चे पर ग्रीनलैंड काफी कमजोर है; यहाँ डेनमार्क के केवल 150 से 200 सैनिक तैनात हैं, जो मुख्य रूप से निगरानी और बचाव(Trump) कार्यों में लगे रहते हैं। हालांकि, अमेरिका का अपना ‘पिटुफिक स्पेस बेस’ पहले से ही वहां मौजूद है। डेनमार्क और यूरोपीय नेताओं ने पहले ट्रम्प की इन बातों को मजाक समझा था, लेकिन वेनेजुएला की हालिया घटनाओं के बाद अब वे इन धमकियों को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं।
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खरीदने की कोशिश या विशेष समझौता?
जहाँ एक तरफ व्हाइट हाउस सैन्य विकल्प की बात कर रहा है, वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का रुख थोड़ा नरम है। उनके अनुसार, प्रशासन का प्राथमिक इरादा हमला करना नहीं बल्कि डेनमार्क से इस द्वीप को खरीदना या कोई विशेष समझौता करना है। ट्रम्प(Trump) प्रशासन का लक्ष्य ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना है ताकि भविष्य में कोई अन्य शक्ति इस क्षेत्र में दखल न दे सके। इसे “ताकत से चलने वाले नियमों” की नई अमेरिकी नीति के रूप में देखा जा रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं?
इसके दो मुख्य कारण हैं: पहला सामरिक और दूसरा संसाधन। ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जहाँ से रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। दूसरा, जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती बर्फ के नीचे छिपे खनिज और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण पाना भी अमेरिका का एक बड़ा उद्देश्य है।
क्या डेनमार्क के लिए ग्रीनलैंड की रक्षा करना संभव है?
सैन्य दृष्टि से डेनमार्क के लिए अकेले अमेरिका जैसी महाशक्ति का सामना(Trump) करना लगभग असंभव है, क्योंकि वहां उनकी सैन्य उपस्थिति (करीब 200 कर्मी) नाममात्र की है। हालांकि, ग्रीनलैंड और डेनमार्क दोनों NATO के सदस्य हैं। ऐसी स्थिति में, अगर अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह नाटो के सिद्धांतों के खिलाफ होगा और एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संकट खड़ा कर देगा।
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