National : अब किसान पराली जलाएंगे नहीं बल्कि उसे बेचकर करेंगे कमाई

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से प्रदूषण में 15-20 फीसदी तक की कमी आएगी। हालांकि कुछ चुनौतियां अभी भी हैं, जैसे पराली इकट्ठा करने की सीमित समयावधि, मशीनों की उपलब्धता और नीतिगत स्वीकृतियों की प्रक्रिया। इसके बावजूद यह योजना ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की सोच को साकार करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सकेगा बल्कि किसानों और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

नई दिल्ली। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के हजारों किसान फसल कटाई के बाद खेतों में बची पराली जलाते हैं। इससे उठने वाला धुआं न केवल वातावरण को प्रदूषित करता है, बल्कि दिल्ली जैसे शहरों में हवा की गुणवत्ता को बेहद खराब कर देता है। इस साल इस समस्या का समाधान केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी लेकर आए हैं। उन्होंने एक अनोखी और दूरदर्शी योजना पेश की है, जिसके तहत पराली से अब सड़कों का निर्माण किया जाएगा। इस योजना का मूल आधार बायो-बिटुमेन है, जिसे पराली और अन्य कृषि अपशिष्ट से तैयार किया जाता है। अब तक सड़कों के निर्माण में बिटुमेन का इस्तेमाल किया जाता था, जो एक पेट्रोलियम उत्पाद होता है और भारत को हर साल इसके लिए करीब 30 हजार करोड़ रुपए का आयात करना पड़ता है, लेकिन अब सरकार इस बिटुमेन का विकल्प ढूंढ रही है, जो पर्यावरण के अनुकूल हो और देश की आर्थिक निर्भरता को भी कम कर सकें। पराली से तैयार बायो-बिटुमेन न केवल टिकाऊ और सस्ता विकल्प होगा, बल्कि इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला लिग्निन नामक तत्व इसे और ज्यादा पर्यावरण हितैषी बनाएगा।

इस योजना से किसानों को भी प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा

इस योजना से किसानों को भी प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। जो पराली पहले जलाकर नष्ट कर देते थे, अब उसे बेचकर किसान अतिरिक्त आमदनी कमा सकेंगे। आंकड़ों के मुताबिक किसान पराली बेचकर प्रति एकड़ करीब 6 हजार रुपए तक कमा सकते हैं, जो पहले सिर्फ 2,500 रुपए प्रति टन थी। इसके अलावा, पराली से बायो-सीएनजी बनाने के लिए भी कई संयंत्र लगाए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। शामली से मुजफ्फरनगर के बीच पहले ही बायो-बिटुमेन से सड़क बनाई जा चुकी है, जो मजबूती और गुणवत्ता के सभी मानकों पर खरी उतरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से प्रदूषण में 15-20 फीसदी तक की कमी आएगी। हालांकि कुछ चुनौतियां अभी भी हैं, जैसे पराली इकट्ठा करने की सीमित समयावधि, मशीनों की उपलब्धता और नीतिगत स्वीकृतियों की प्रक्रिया। इसके बावजूद यह योजना ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की सोच को साकार करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सकेगा बल्कि किसानों और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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Anuj Kumar

लेखक परिचय

Anuj Kumar

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