गिरावट के मुख्य कारण और वैश्विक दबाव
नई दिल्ली: रुपये में इस बड़ी गिरावट के पीछे सबसे प्रमुख कारण मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का $107 प्रति बैरल के पार जाना है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार(International Market) में कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो भारत को इसके भुगतान के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ जाता है। साथ ही, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकालने और सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर को चुनने से रुपये की वैल्यू में ऐतिहासिक कमी आई है।
महंगाई का बढ़ता बोझ और ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’
डॉलर(Dollar) के मजबूत होने से भारत में ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ (आयातित मुद्रास्फीति) का खतरा पैदा हो गया है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी आयात करता है, इसलिए इनका भुगतान अब महंगा होगा। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, माल ढुलाई और अंततः दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर पड़ेगा। मोबाइल, लैपटॉप और अन्य विदेशी सामानों की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ विदेश में पढ़ाई और यात्रा करना भी अब आम भारतीयों के लिए काफी महंगा हो जाएगा।
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भविष्य की चुनौतियां और सरकारी प्रयास
बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि भू-राजनीतिक हालात नहीं सुधरे, तो रुपया जल्द ही ₹100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकता है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने कीमती धातुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है ताकि डॉलर की निकासी को रोका जा सके। ओपेक देशों द्वारा उत्पादन में कटौती और सप्लाई चेन (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) में बाधा के कारण ऊर्जा संकट 2027 तक खिंच सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक लंबी अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है।
रुपये के कमजोर होने से आम आदमी पर सबसे बुरा असर क्या होगा?
सबसे बुरा असर महंगाई के रूप में दिखेगा। कच्चा तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ेगी, जिससे फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामान महंगे हो जाएंगे। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेशी सेवाओं के लिए आपको ज्यादा कीमत चुकानी होगी।
क्या डॉलर के मुकाबले रुपया फिर से मजबूत हो सकता है?
हां, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, मिडिल ईस्ट में शांति बहाल होती है और विदेशी निवेशक फिर से भारतीय बाजार में पैसा लगाना शुरू करते हैं, तो रुपया रिकवर कर सकता है। हालांकि, मौजूदा ग्लोबल सेंटिमेंट को देखते हुए इसमें समय लग सकता है।
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