न्यायपालिका पर गंभीर सवाल और सत्याग्रह का रास्ता
नई दिल्ली: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शराब नीति घोटाला मामले में दिल्ली(Delhi) हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच पर गंभीर आरोप लगाए हैं। केजरीवाल ने एक वीडियो संदेश के माध्यम से घोषणा की है कि वे अब हाईकोर्ट में न तो खुद पेश होंगे और न ही उनकी ओर से कोई दलील(Argument) दी जाएगी। उन्होंने कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इस बेंच के सामने पेश होने की अनुमति नहीं देती है क्योंकि उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। उन्होंने इस प्रक्रिया को महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’ के मार्ग के अनुरूप बताया है।
हितों के टकराव (Conflict of Interest) के आरोप
केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए मुख्य रूप से दो बिंदु उठाए हैं:
बच्चों के करियर का संबंध: केजरीवाल का दावा है कि जस्टिस शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकील पैनल का हिस्सा हैं और उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा भारी संख्या में केस (उनके अनुसार बेटे को 2023-25 के बीच 5904 केस) दिए गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि जज के बच्चों का करियर केंद्र सरकार के अधीन है, तो उनके खिलाफ फैसला सुनाना मुश्किल है।
विचारधारा और संबद्धता: केजरीवाल ने यह भी आरोप लगाया कि जस्टिस शर्मा अतीत में RSS से जुड़े ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं, जिससे उनकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।
कानूनी प्रक्रिया और घटनाक्रम
यह मामला निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) द्वारा 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल समेत अन्य आरोपियों को बरी करने के फैसले के बाद शुरू हुआ। CBI ने निचली अदालत के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। केजरीवाल ने हाईकोर्ट में जस्टिस शर्मा को केस से हटाने के लिए याचिका भी दाखिल की थी, जिसे 20 अप्रैल को अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया था कि वे मामले से खुद को अलग नहीं करेंगी, क्योंकि दबाव में आकर जज को बदलना एक गलत संदेश देगा।
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मामले का राजनीतिक और कानूनी संदर्भ
दिल्ली की आबकारी नीति (शराब नीति) में कथित अनियमितताओं के कारण केजरीवाल और उनके सहयोगियों (जैसे मनीष सिसोदिया) को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था। निचली अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद CBI का हाईकोर्ट जाना और वहां केजरीवाल द्वारा जज पर सवाल उठाना इस पूरे कानूनी विवाद को और अधिक जटिल बनाता है। जहां एक ओर केजरीवाल इसे ‘झूठे केस’ और ‘चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश’ करार दे रहे हैं, वहीं कानूनी हलकों में एक मौजूदा जज पर लगाए गए इन आरोपों की तीखी चर्चा है।
अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर ‘हितों के टकराव’ का क्या आरोप लगाया है?
केजरीवाल का आरोप है कि जस्टिस शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकील पैनल का हिस्सा हैं और उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा बड़ी संख्या में केस दिए जा रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे जज के बच्चों के करियर और सरकार के बीच एक सीधा संबंध बनता है, जो निष्पक्ष सुनवाई में बाधा डाल सकता है।
निचली अदालत और हाईकोर्ट के रुख में क्या अंतर है?
निचली अदालत ने 27 फरवरी को केजरीवाल को इस मामले में बरी कर दिया था और CBI की जांच की आलोचना भी की थी। इसके विपरीत, हाईकोर्ट में CBI ने अपील की है और जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसके खिलाफ केजरीवाल ने जज को बदलने की याचिका दी थी जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
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